13th April, 2016
कहानी- हमसबकी-२
 
 

सही के लिये मानव मात्र की स्वीकृति है, गलत के लिये किसी एक की भी स्वीकृति नहीं है.

झाबुआ की बात. झाबुआ प्रसिद्ध आदिवासी इलाका है.

यहाँ एक नाम का बङा आतंक चलता है- दीवान सिंह.

सरकार ने दीवान सिंह पर पचास लाख का ईनाम घोषित कर रखा है. दीवान सिंह को जो पकङवाये, उसे सरकार पचास लाख देगी, किन्तु किसी भी थानेमें दीवान सिंह की एक भी फ़ोटो उपलब्ध नहीं है. यह अलग बात है कि हर नया कलक्टर या दूसरा अफ़सर पहले दीवान सिंह की ड्योढी पर हाजरी देता है, फ़िर चार्ज संभालता है. चुनावों  में प्रचार के लिये उतरने से पहले हर पार्टी का प्रत्याशी दीवान सिंह का आशीर्वाद प्राप्त करता है. दीवान सिंह की मर्जी के बिना झाबुआ में पत्ता भी नहीं हिलता, किन्तु खुद दीवान सिंह अपने दो बेटों को अपने से दूर होस्टल में रख कर पढा रहा है.

“यह तो मूर्खता है. सरकार कभी भी तुम्हारे बेटों को पकङकर तुम्हें मजबूर कर सकती है. तुम इतनी बङी रिस्क कैसे ले लेते हो?”- मैंने एक बार पूछा.

“मेरी छाया भी मेरे बेटों पर ना पङे, इसके लिये मैं कोई भी रिस्क ले सकता हूँ.”- दीवान सिंह कहता है.

वह जानत है कि उसका काम गलत है.

गलत के लिये किसी की स्वीकृति नहीं होती.- साधक उम्मेद सिंह बैद

 
 

 


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