13th April, 2016
औसान
 
 

“उठो बहू! भोर का तारा ऊग आया है|”
“हाँ माँजी! हम उठ गये हैं| मैं दही बिलोने की तैयारी कर रही हूँ| हीरा और बेला गेहूँ पीसने बैठ रही है| आरती बाकी बहुओं को जगा रही है…|” बङी बहू पार्वती  ने अपनी सास के पैर छूते हुये कहा|
“गायों को नीरने कौन कौन गया है पार्वती?” सास भगवती ने पूछा|
“ तुम क्या समझती हो कि हमारी बहुएं ही भोरमें जल्दी उठकर काम में लगती हैं? हमारे तीनों बेटे पहले ही ऊठकर अपने-अपने काम लग गये हैं| शंकर और  कैलाश गौशाला में| भोला और विष्णु खेतों में गये|” बाबा ने अपनी सह-धर्मिणी भगवती से सदा की तरह कहा|
“ और आपका लाडला राम तो रात से ही तारों की गिनती में लगा होगा, उसको किसी काम के लिये क्यों नहीं कहते?” भगवती ने बाबा को पलटकर टोका|
“ तुम नहीं जानती कि राम कितना बङा काम कर रहा है| अपनी दूरबीन पर वह ग्रह-नक्षत्रों की गतियाँ और स्थितियाँ जाँचता रहता है| दुनियाँ भर के खगोल-विज्ञानी राम से सलाह-मशविरा करने आते हैं| राम के लिये निजी हवाई जहाज और हेलीकोप्टर की व्यवस्था अन्तर्राष्टीय समाज करने का प्रस्ताव ला रहा है|” बाबा ने अपने सातवें बेटे राम की प्रतिभा की सराहना करते हुये कहा|
बाबा अपने कम्प्यूटर पर बैठे दुनियाँ की खबरों का जायजा लेने लगे|
बाबा के सात बेटे, इकत्तीस पोते-पोतियाँ हैं| ग्यारह पोतियाँ विवाह करके अपने ससुराल जा चुकीं हैं| सात पोतों का विवाह हुआ, और उनकी सौलह सन्तानें भी पूरी श्रमशील और प्रतिभाशाली हैं| सबसे बङा अभिषेक तो अपने तीन चाचा-बुआ से उम्र में बङा है, गाँव के सब बच्चों का सहज नायक है| आठ वर्ष का नवल अपनी चचेरी बहन चंचल के साथ इन्टरनेट पर नई-नई जानकारी लेता रहता है|
पतोहूओं में सबसे बङी साधना को सारी देवरानियाँ जीजी की तरह मानती हैं| सब साधना के कहने में हैं| गृहस्थी के सारे काम साधना के निर्देशन में इन तीसकी टीम ने संभाल रक्खा है| अपनी चारों सासुओं को आदर पूर्वक आराम देना चाहती हैं, किन्तु पार्वती, हीरा, बेला, आरती आदि उनकी चारों सास अभी पूरी तरह सक्रिय हैं, भोरमें इनसे पहले उठकर काममें लग जाती हैं| दो सास-ससुर स्वर्गवासी हुये। राम ज्योतिष-शोध में ऐसे लगे कि अविवाहित ही हैं।
तीसरी पीढी की बहुओं के खेलने खाने के दिन हैं| घरमें कोई उनको किसी काम के लिये नहीं कहता| कभी कोई नई बहू संकोच वश अपनी सास के हाथ से झाङू लेने का आग्रह करे भी तो सास प्यार से कहेगी, “ बहू, तुम अपनी जेठानी प्रज्ञा और लता को संभालो| वे पूरे दिनों से हैं| जाओ उनके पैरों में मालिश करो| उनको भूख लग आई होगी| ताजा मक्खन-रोटी खिलाओ उनको|”
पूरे औसान गाँव के लिये यह घर आदर्श और अनुकरणीय है| चारों ही पीढीयाँ परस्पर स्नेह सहित रहते हुये गाँव के कामों के लिये सहज उपलब्ध रहती हैं| गाँव में कुल ग्यारह घर हैं| सभी दसों घरों के बूढे बाबा के छोटे भाई हैं| बाबा के कहने पर ही सबने अपना-अपना परिवार अलग बसाया, वरना सभी भाईयों में परस्पर स्नेह-विश्वास  है| बाबा- भगवती दोनों जागृत देव मानव हैं| शेष दसों भाई अपने इस जागृत बङे भाई का अनुकरण करते हुये जागृति-क्रममें सतर्कता पूर्वक अपने कार्य-व्यवहार-विचार का अध्ययन करते हैं|
बाबा के दो बेटे भोला और कैलाश जागृति- अवस्था को पा गये हैं, किन्तु अभी उन्होंने इसकी घोषणा नहीं की| बाबा सब जानते-समझते हैं, किन्तु अपनी जागृति की घोषणा हर साधक को स्वयं ही करनी होती है|
जयपुर की आग
नवल और चंचल दौङते हुये बाबा के पास आये|
“बाबा! बाबा! जयपुर में पेट्रोल कुओं में आग लगी है|”
“ यह तो मैं भी देख रहा हूँ चंचल! यह अपने प्रदेश का सबसे बङा पेट्रोल भंडारण का टैंक है| देख रहा हूँ कि आग कैसे लगी| अभी वहाँ के अधिकारी-इंजीनियर तो कुछ बता नहीं पा रहे…|” बाबा ने स्क्रीन पर तलाश जारी रखते हुये कहा|
“बङी दुर्घटना है बाबा! आपको चिन्ता नहीं होती?” नवल ने धीरे से पूछ ही लिया|
बाबा स्क्रीन पर व्यस्त रहे| उत्तर भगवती ने दिया,
“ चिन्ता नहीं करते बेटा! चिन्तन करो, समस्या का हल मिल जायेगा| जयपुर की घटना है तो तुम अभिषेक को पहले बुला लाओ| वह श्रेया के ससुराल में महीना भर रहकर अभी-अभी लौटा है, जरूर वहाँ उसके दोस्तों की फ़ौज होगी, वह काम आ जायेगी|”
श्रेया बाबा के चौथे बेटे भरत की पोती है| अपने पिता पुरुषोत्तम और माता वैदेही की तरह ही सामाजिक कार्यों के लिये उसकी रुचि रहती है| बाबा ने भी हामी भरी,
“ वैदेही को भी बुलाओ| उसे जयपुर भेजना होगा| अपनी बेटी के साथ रहकर मन लायक काम का यह अवसर वैदेही कैसे छोङ सकती है|”
चंचल ने तत्काल अभिषेक भैय्या को एस|एम|एस| किया| नवल ने अपनी दादी वैदेही को बुलाने के लिये दौङ लगाई|
पाकशाला के सामने बेला अपनी ग्यारह बहुओं और सात पतोहुओं सहित सारे बच्चों को सुबह का नाश्ता करा रही है| वैदेही सबके साथ नाश्ता कर रही है|नवल को बाबा की कोठङी से दौङ कर आते देखा तो एकदम सावधान हो गई| सभी जानते हैं कि बाबाके पास आना-जाना बहुत शालीनता और संकोच सहित होता है| नवल की शारीरिक चंचलता से सबको आभास हुआ कि कोई न कोई गंभीर बात हुई है|
“ताईजी! आपको बाबा बुला रहे हैं…|” नवल की आधी बात सुनकर ही वैदेही ने हाथ का कौर वापस बर्तन में रक्खा| हाथ धोकर ओढनी का पल्लू सिर पर लेकर बाबा की कोठङी की तरफ़ बढ ही रही थी कि वहीं खङा चौदह सालका नितिन सबको सुनाकर बोला, “ भैया अभिषेक का एस|एम|एस| है| आज वे कोई कक्षा नहीं लेंगे| जयपुर के तेल-कुओं में आग लग गई है| वे अपनी घुङसवारी की टीम से निपटकर तत्काल बाबा से मिलने आ रहे हैं| मुझे पहले बाबा से मिलने को कहा है|  भारती,मीनाक्षी,अंशुल और आदेश्वर तुम चारों नाश्ता छोङकर नेट पर बैठो| अभिषेक भैया की जयपुर टीम को एलर्ट रक्खो| घटना सम्बन्धी सारी डिटेल तैयार करो| मैं भी चाची के साथ ही बाबा के पास जाता हूँ|” कहकर नितिन ने लपककर वैदेही हाथ थाम लिया| चलते हुये फ़ुसफ़ुसा कर चाची को छेङा-
“ आपकी तो लाटरी निकल आई है चाची| अपनी प्यारी बेटी के साथ रहने का अवसर दे रहे हैं बाबा! और आग पर तो अभिषेक भैया की टीम काबू पा ही लेगी|”
“बङा भरोसा है अपने भैया पर! और यह आग की क्या कहानी है?” वैदेही ने पूछा|
“जयपुर के तेल कुओं में भयंकर आग लगी है। बाबा अभिषेक भैया को आग बुझाने भेजेंगे…”
वैदेही का अभिषेक पर मान भी चौगुना है, भाईयों के बीच परस्पर विश्वास और स्नेह तो स्पष्ट है ही, अपने गाँव औसान से चारसौ किलोमीटर दूर जयपुर के जन-समाज पर आये संकट को हल करने के लिये इनकी तत्परता भी वैदेही के मन में तोष का संचार करता है|
“ आपका भरोसा तो दीदी पर ही है ना!” नितिन अपने स्वभाव का चुलबुलापन ऐसे संकट के समय भी छुपा कहाँ पाता है|
वैदेही ने नितिन के गाल थपथपा कर उसे चुप किया, “बाबा के सामने शान्त रहना!”
तीन
 अभिषेक गाँव की धुङसवारी-पसन्द टोली के साप्ताहिक वर्गमें सबको सिखा रहा है|  सभी ग्यारह परिवारों के पास पशुधन प्रचुर है। सबकी अपनी-अपनी गौशाला, घुङसाल, ऊँट, बैल, भैंस, बकरी कुत्ता एवम कई पालतू पक्षी भी हैं। किशोरों में घुङसवारी, ऊँट-सवारी आदि का शौक सहज ही है। नये नये करतब सीखने के लिये साप्ताहिक वर्ग की रचना है। आज अजय इस टोली में पहली बार आया है| दो-तीन अलग-अलग स्वभाव के घोङों की सवारी पर अभ्यास के बाद ही इस साप्ताहिक वर्गमें अभिषेक के निर्देशन में अभ्यास की अनुमति मिलती है| अमित,श्रवण और विक्रम ने दो-दो घोङों पर एकसाथ एक किलोमीटर की सवारी करके दिखाई, तो चमत्कृत अजय ने पूछा,-
“ हमारे गाँव के घुङसवार पोलो खेल में भाग क्यों नहीं ले सकते भैया? यहाँ तो सभी का सन्तुलन,चुस्ती और घोङों पर नियन्त्रण अतुलनीय है| मैंने जयपुर में हुआ गत वर्ष का पोलो खेल नेट पर देखा है| ऐसा कौशल किसी में नहीं है भैया|”
अभिषेक मुस्कुराया| “ जीतना चाहते हो? दुनियाँ में नाम कमाना चाहते हो?”
अजय विस्मित हुआ| “ अरे! आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे नाम कमाना भी बुरी बात है| और जीतने से तो सबको ही खुशी होती है भैया…||”
“सबको नहीं अजय!  सबको खुशी हो पाये तो प्रतियोगिताओं और जीत में कोई नुक्सान नहीं| हम सब भी पोलो खेलना ही चाहते हैं| और तुम्हारा यह अनुमान भी सही है कि औसान गाँव के ये सारे किशोर सिर्फ़ घुङसवारी ही नहीं, भारत में चल रही किसी भी खेल-प्रतियोगिता को जीत सकते हैं| किन्तु इससे सबकी खुशी का मार्ग नहीं बनता अजय!”- अभिषेक ने अजय को समझाने का प्रयास  किया|
“मैं समझा नहीं भैया| यह आप क्या कह रहे हैं? और यदि प्रतियोगिता नहीं जीतना है तो घुङसवारी का लाभ क्या है?” अजय फ़िर विस्मित हुआ|
“क्यों? मैं घर से यहाँ दस किलोमीटर दूर कैसे आता? तुम शहर से सौदा कैसे ला पाते?” अभिषेक ने अजय को तोलना आरम्भ किया|
“मोटरसाईकिल है ना| बस भी तो चलती है… आजकल घोङों पर कौन सौदा लाने जाता है?” अजय का उत्तर|
“ अरे, मोटर साईकिल पर पैरों का व्यायाम कैसे होगा? और पेट्रोल जो जलता है| क्या तुम नहीं जानते कि पेट्रोल निकालने से धरती का स्वास्थ्य खराब हो रहा है| पेट्रोल जलने से निकलती कार्बन-मोनो-आक्साईड गैस धरती के रक्षा-कवच ओजोन परत में छेद करती जा रही है| और यार! मोटर साईकिल पर सवारी करने से मेरा सफ़ेद कुर्ता एकदम काला हो जाता है| कपङों का काला होना मुझे तो नहीं भाता| तुमको अच्छा लगता है क्या?”- अभिषेक पूरी तरह विनोद के भाव में आ गया|
“आप तो मजाक बना रहे हैं भैया! सही बात को गोल कर रहे हैं| बताईये ना…” अजय रुँआसा सा हो गया|
“इसे समझने के लिये तुम्हें सात दिनका शिविर करना चाहिये अजय|” अभिषेक ने अपने जेब में बजते फ़ोन को बाहर निकालते हुये कहा|
अभिषेक ने देखा कि फ़ोन जयपुर से आनन्द का था|
“ हाँ आनन्द! कैसे हो? इस समय फ़ोन कैसे किया?”
“आपको अब तक खबर नहीं हुई भैया? जयपुर संकट में है| तेल के भण्डार में आग लग गई है| शासन-प्रशासन सकते में है| किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करे? स्थिति बहुत भयावह है| आप आईये ना!” आनन्द ने बताया|
“ओह! मैं नेट पर देखकर बात करता हूँ, घबराओ नहीं| अपनी टोली को खबर कर दो, सब परस्पर सम्पर्क में रहें| अपनी साईट खोलकर रखना| मैं जल्दी सम्पर्क करता हूँ|” अभिषेक ने फ़ोन काटा|
उसी समय चंचल का एस|एम|एस| भी आ गया, “फ़ौरन आओ| बाबा बुला रहे हैं|”
अभिषेक ने टोली-नायक विक्रम से कहा, “ मुझे अभी जाना होगा विक्रम! तुम अभ्यास पूरा कराके सबको बिठाना| जयपुर से किसी बङी दुर्घटना के समाचार मिले हैं| शायद हम सबको ही इसके निवारण में लगना पङ सकता है| मैं घर पहुँच कर बताता हूँ|”
“ठीक है भैया| आप उचित समझें तो मुझे जयपुर के आनन्द का नम्बर दे दें|”- विक्रम अभिषेक के चेहरे पर आये तनाव को भाँप कर मन ही मन अपनी भूमिका तय करके बोलता है|
“ हाँ, क्यों नहीं| बल्कि तुम और तीन जन के नम्बर भी ले लो| उनसे बात करके पूरे हालात जानो, और अपनी टीम को परिस्थिति के अनुकूल तैयार रक्खो| चाहो तो घुङसवारी के अभ्यास को आज यहीं विराम दे सकते हो…| अजय से बात करना| उसे सात दिन का सूचना शिविर करना आवश्यक लगता है|” अभिषेक ने विक्रम को अपनी जयपुर टीम के चार मोबाईल नम्बर दिये, और अपने चेतक पर बैठकर घर की राह ली|
चार
बाबा के कमरे में बाकायदा मीटींग शुरु हो गई|
अभिषेक, नितिन, वैदेही, मीनाक्षी और अंशुल बाबा को घेर कर बैठे हैं, जबकि नवल,चंचल, भारती  और आदेश्वर चारों अपने अपने लेपटोप खोलकर अलग-अलग साईटों पर सूचनायें एकत्र कर रहे हैं|
“ अभिषेक! तुमको क्या बताया आनन्द ने?” बाबा ने पूछा|
“आनन्द ने तो सिर्फ़ आग की भयावहता का बताया है| किन्तु विभिन्न चैनलों पर आ रही सूचनाओं से हमें वहाँ की काफ़ी जानकारी हो गई है| तीन दिशाओं में स्थित चार टैंक आग की चपेट में हैं| पूर्व की तरफ़ अभी टैंक बचे हैं, किन्तु उन्हें बचाने का न इंजीनियरों के पास कोई उपाय है, ना प्रशासन के पास| आग इतनी प्रचण्ड है कि जिन्दा पेङ तक धू-धू करके जलते दिखते हैं| धुंयें का गुब्बार आस-पास के चालीस गाँवों को आतंकित कर रहा है|” अभिषेक ने अपनी सूचनायें सबके साथ बाँटी|
“ अभी प्रशासन इस बात को जाँचने में लगा है कि आग लगी कैसे? भारती और आदेश्वर ने गूगल अर्थ की सहायता से दो-तीन संभावनायें बताई हैं…|” अंशुल ने बताना चाहा, तो बाबा ने उसे रोककर भारती को ही बताने के लिये कहा|
भारती और आदेश्वर दोनों ने अपना लेपटोप बाबा और अभिषेक के सामने करते हुये कहा, “ पहला विस्फ़ोट पश्चिम दिशा के टैंक में हुआ है, हालाँकि विस्फ़ोट से पहले गहरा धुंआ उत्तर से भी उठता दिखा है| पश्चिमी टैंकों पर नियुक्त इंजीनियर आज छुट्टी पर है, और बाकी में से कोई कुछ नहीं बता पा रहा है| संभव है कि यहाँ किसी कर्मचारी की गलती से बिजली का शोर्ट-सर्किट हुआ हो और आग लग गई हो…|” आदेश्वर बोला|
“ उत्तर दिशा से उठते धुंये से लगता है कि इधर के इंजीनियर को जमा पेट्रोल के प्रेशर में फ़टने की कोई संभावना लगी हो| उसने इस प्रेशर को संभालने के लिये  सेफ़्टी वाल्व खोला है| उस वाल्व में खराबी रही, वह वापस बन्द नहीं हुआ| खुले वाल्व को छोङकर इंजीनियर कोफ़ी पीने चला गया| बहता पेट्रोल किसी प्रकार आग के निकट पहुँचा और हादसा हो गया| इंजीनियर तो अन्य चार कर्मियों के साथ विस्फ़ोट की भेंट चढ गया| एरिया मैनेजर की स्फ़ुट सूचनाओं के आधार पर यह संभावना दिख रही है|” भारती ने अपना मत दिया|
“एक और संभावना जयपुर टीम से मिली सूचनाओं के आधार पर भी बनती है| चारों तरफ़ नब्बे गावों के लोग सप्लाई पाईपों में से तात्कालिक रास्ता बनाकर पेट्रोल की चोरी किया करते हैं|  कई बार ऐसी वारदातें पकङी गई हैं, मगर प्रशासन एक लीक बन्द करता है तो शीघ्र ही नये दो-तीन लीक बना लिये जाते हैं। संभव है कि ऐसी ही किसी लीक पर किसी ने बीङी आदि जलाई हो और रिसते पेट्रोल ने आग पकङ ली हो|” अभिषेक ने अपना मत दिया|
“ हुम्म्म…|” बाबा सभी सूचनाओं के विश्लेषण-चिन्तन में लग गये| तभी दूर बैठी चंचल ने बताया,” “ मुख्यमंत्री ने बयान दिया है कि आग पर चौबीस घंटे में काबू पा लिया जायेगा|”
यह सुनकर बाबा के होठों पर हल्की सी मुस्कान आई|
उन्होंने आदेश्वर से कहा, “ जरा पिछले सप्ताह के पेट्रोल के इनपुट-आऊटगोईंग का हिसाब निकालो| अभी सारे टैंकों में कुल कितना पेट्रोल है, बताओ|”
आदेश्वर और भारती दोनों काम में लग गये|
तभी अभिषेक के फ़ोन पर घंटी बजी|
विक्रम का फ़ोन है| अभिषेक ने बाबा की अनुमति से स्पीकर ओन कर दिया| विक्रम ने बताया, “ स्थितियाँ बहुत भयावह हैं| मुख्यमंत्री महोदय ने जनता को झूठी दिलासा दी है कि चौबीस घंटों में आग पर काबू पा लेंगे| मैंने पता लगाया है कि सारे एक सौ चालीस टंकों में पेट्रोल भरा है| अगर जल्दी ना रोका गया तो दो सप्ताह तक जयपुर जलता रहेगा| इतना जहरीला धुंआ बनेगा कि आस-पास के हजारों गाँव वर्षों तक इसके दुष्प्रभाव में बीमार रहेंगे| छोटे-मोटे बीस नगरों को खाली कराना पङेगा| सारी व्यवस्थायें चरमरा जायेंगी|”
अभिषेक ने पूछा, “ जयपुर टीम का सम्पर्क कितने गाँवों से है? पता करो कि हम कितने कम समय में चारों तरफ़ के निकटवर्ती गावों में काम शुरु कर सकते हैं…|”
“ अमित और श्रवण ने पता किया है| जयपुर टीम लगभग दो सौ गावों तक बने सम्पर्कों पर भरोसा रखती है| एकल-विद्यालय, कल्याण-आश्रम, बजरंग-दल, संघ-शाखायें, आर्य-समाज, महिला-संस्थायें, मन्दिर और मस्जिदों सबसे बात हो रही है| आस-पास के कुओं और जल-स्रोतों को आग बुझाने हेतू काम में लिया जा सकता है, पर यह सब काफ़ी नहीं होगा…|”
“ अजय के साथ अपने ८-१० मित्रों को जयपुर रवाना कर दो| सबके मोबाईल न| अमित को दे दो| यहाँ अमित और श्रवण लगातार नेट पर बैठें| तुम यहाँ चले आओ| ओवर एण्ड आऊट|”
अभिषेक ने कुशल सेनापति की तरह आदेश दिया|
वैदेही के चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी|
बाबा चिन्तन-मुद्रा में हैं|
द्वार पर एक बहू सबके लिये तक्र लेकर आई|
पाँच
वैदेही ने कहा, “ श्रेया का फ़ोन आया| उसकी तरफ़ से बीस युवतियों की टीम सीधे आग बुझाने जाने को उत्सुक बैठी है| मैंने ही उसे रोका है कि इस तरह तो वहाँ और ज्यादा अव्यवस्था फ़ैलेगी|”
यह सुनकर नितिन ने अपनी सूचना दी-“ वहाँ पहले से ही अफ़रा-तफ़री का माहौल बना हुआ है| पुलिस भीङ को संभाल नहीं पा रही| फ़ौज को बुलावा दे दिया गया है| वहाँ सब अपनी-अपनी हाँक रहे हैं| सुचिन्तित/सुव्यवस्थित रूपसे कुछ भी नहीं हो पा रहा| श्रेया को यह ठीक से बता देना आवश्यक है|”
“मगर करना क्या है? यह भी तो बताना होगा ना!” वैदेही ने उत्सुकता और त्वरा दिखाई|
इसी समय विक्रम भी आ गया| सबने मुस्कुरा कर विक्रम का स्वागत किया| सभा की कारवाही को आगे बढाते हुये विक्रम बोला-
“वहाँ कुछ भी शुरु करने से पहले शासन-प्रशासन को विश्वास में भी तो लेना होगा| उनकी अनुमति/सहमति के बिना वहाँ परिन्दा भी पर नहीं मार सकता है|”
“ वह कोई मुश्किल काम नहीं है| श्रेया के मामा-ससुर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं, गृह-मंत्री के अन्तरंग मित्र हैं| अपने जयपुर प्रवास में मेरी उनके साथ काफ़ी बातचीत हुई है हम जैसा चाहेंगे, उनको विश्वास में लेकर करवाया जा सकता है|” अभिषेक ने बताया|
बाबा मुस्कुराये| अभिषेक अपने हम-उम्रों के साथ तो घुलता-मिलता ही है, अपने रुचि-विरुद्ध राजनैतिक प्रकृति के लोगों में भी स्वीकृत हो जाता है|
“केन्द्र से सम्पर्क करके सेना के हेलीकोप्टरों को भी लगाना होगा| आकाश से रासायनिक पाउडर गिराकर आग पर काबू करने का उपाय करना पङ सकता है” –वैदेही ने अपना मत रखा|
“ वहाँ जयपुर में प्रशासनिक अधिकारियों की क्या योजना चल रही है, इसकी सूचना मैं प्राप्त कर सकता हूँ| मेरी जयपुर टीम में अरुण के पिता गुप्तचर विभाग के प्रमुख हैं| हालाँकि अरुण अपने पिता से अधिकाँशतः असहमत ही होता है, किन्तु इकलौता बेटा होने का लाभ मिल सकता है, क्या मैं प्रयत्न करुँ?” अभिषेक ने बाबा से पूछा|
बाबा चुपचाप सुनते रहे|
इतने में विक्रम का फ़ोन बजा|  जयपुर से आनन्द बात करना चाहता है| अन्य किसी भी फ़ोन को इस समय सुनने का प्रश्न ही नहीं, तो इस फ़ोन को फ़ौरन ना सुनने का भी प्रश्न नहीं| विक्रम ने फ़ोन सीधा अभिषेक को दिया|
“हाँ आनन्द! बताओ, क्या सूचना है?” –अभिषेक ने स्पीकर ओन करके बात शुरु की, ताकि सब सुन सकें|
“स्थितियाँ बेकाबू होती जा रही हैं| प्रशासन ने कोशिश की कि पूर्व की तरफ़ के टैंकों को लपटों से बचाया जा सके| इस कोशिश में पता नहीं क्या हुआ कि एक साथ चार टैंकों में विस्फ़ोट हो गया| सत्रह दमकल कर्मी आग की भेंट चढ गये| धुंये का प्रकोप और सैकङों गावों को चपेट में ले रहा है| अपनी टीम बैचेनी से बैठी इन्तजार कर रही है, आप कब आ रहे हैं भैया?”- आनन्द ने पूछा|
“ मैं और विक्रम अभी बाबा से परामर्श पर हैं| औसान से बीस युवक जयपुर के लिये रवाना हो गये हैं| तुम अपनी टीम में श्रेया जीजी को भी शामिल कर लो| अरुण से कहो कि जयपुर के चारों तरफ़ की आठ तहसील-केन्द्रों के प्रशासन का जायजा ले| संभव है कि जयपुर का बस-रेल सम्पर्क काटना पङ जाये| ऐसी स्थिति में हमको तीन-चार सौ मोटर-साईकिलें चाहिये| कुछ बङी वैन भी चाहिये होगी| व्यवस्था करके रखें| और बतायें|” अभिषेक ने अब तक की स्थितियों के अनुरूप भावी संभावनाओं को आंक कर बात की|
“ यह सब तो आसानी से हो जायेगा भैया| किन्तु यह आग हमें ज्यादा सोच-विचार का अवसर नहीं दे सकती| अब तो जयपुर के लोग भी मकान खाली करके भागने की बातें करने लगे हैं| मुख्यमंत्री महोदय के यहाँ आपात बैठक चल रही है| सारे काम युद्ध-स्तर पर जारी हैं| पर आम आदमी को प्रशासन पर जरा भी भरोसा नहीं| अरुण को सूचना मिली है कि इंजीनियरिंग कालेज के छात्र एक आकस्मिक मीटींग में बैठे हैं और उनके हेड यह मीटींग ले रहे हैं| संभव है कि आग बुझाने के लिये ही कोई योजना कर रहे हों|  क्या हम इस आग पर काबू पा सकेंगे भैय्या?” आनन्द का दिल बैठा जा रहा है| यह अनुमान करके अभिषेक बोला- “ अवश्य बुझा सकेंगे आनन्द| बाबा हैं, हम सब हैं, कोई ना कोई रास्ता निकलेगा| चिन्ता मत करो| मैं तुमसे शीघ्र सम्पर्क करता हूँ| ओवर एण्ड आऊट|” अभिषेक पूरे विश्वास में है|
“हाँ भैया! यदि आग जल्दी ना बुझा पाये तो यह हजारों टन धुंआ आकाश में टिक जायेगा| सामने बारिश का मौसम है| यह जहर पानी के साथ धरती पर गिरेगा| हमारे तालाबों, कुओं को प्रदूषित करेगा| खेती भी बर्बाद होगी|” विक्रम की बात ने भयावहता को और भयानक कर दिया| अभिषेक ने फ़िर दोहराया- “ आश्वस्त रहो विक्रम| हम आग बुझा देंगे|
बाबा आश्वस्त हैं कि नई पीढी के ये युवक-किशोर सारी समस्याओं पर काबू पा सकेंगे|
पुरानी पीढी के पास इतना ही काम है कि वह योग्य मार्ग सुझा दे, शेष सारा नई पीढी कर ही लेगी|
टी|वी पर मुख्यमंत्री महोदय फ़रमा रहे हैं, “ आग पर काबू पाना असंभव लग रहा है| जितना पेट्रोल बचा है,वह सारा शेष होने पर ही आग अपने आप बुझेगी| शासन इस बात का ध्यान रख रहा है कि इस आग में अब और मनुष्य अपनी जान न गँवा दे| जनता को हुई असुविधा के लिये हमें खेद है|”
“हमें नया कुछ करना होगा| प्रचलित उपायों से तो यह आग काबू में आने से रही|” बाबा चिन्तन-पूर्वक बोले|
सब चुप!
बाबा के चिन्तन-प्रवाह का अबाधित रहना अपेक्षित है, तभी वे किसी निश्चय पर पहुँचेंगे|
छः
 बाबा अपने कमरे में अपनी सह-धर्मिणी के साथ हैं|  बाबा ने अभी-अभी कई फ़ोन किये हैं| अभिषेक की टीम बाबा के कहे अनुसार सक्रिय है| वैदेही को साथ लेकर विक्रम और शंकर-पार्वती  जयपुर पहुँच चुके हैं|
बाबा ने आदेश्वर और भारती को नेट से सूचनायें लेने-देने के लिये अपने साथ रक्खा है| नवल और चंचल को आग्रहपूर्वक उनकी कक्षा में भेजा गया है| अभी उनकी उम्र इतने गंभीर विषय पर सोचने-विचारने की नहीं, उनको इससे पूर्व और अनेक विषय और बातें जानने की हैं| इसी घर की दालान में घर की एक बहू ७-८ वर्ष के गाँव के सब बच्चों को इस समय अंक-ज्ञान सिखाती है| नवल-चंचल का मन आज जयपुर में अटका है, इसलिये सब छात्रों को पहाङे बोल-बोल कर रटने का अभ्यास चलाया| एक बच्चा पहाङा बोलता है, सब बच्चे एक साथ उसे दोहराते हैं-
“ एक्का एक्का एक्का  – एक्का एक्का एक्का|
भरभरिया का चौका  –  भरभरिया का चौका|
तियां मियां नौका – तियां मियां नौका|
चौक मौक सोलह – चौक मौक सौलह|
पाऊँ पाऊँ पच्चीस – पाऊँ पाऊँ पच्चीस|
छकङ-मकङ छत्तीस – छकङ मकङ छतीस|
सात्यूं सत्ता उनन्चास – सात्यूं सत्ता उनन्चास|
आठ्यूं अट्ठा चौसठ| – आठ्यूं अट्ठा चौसठ|
नौ नमां इक्यासी – नौ नमां इक्यासी|
ढाये ढाये सौ पूरा| – ढाये ढाये सौ पूरा|

सारे बच्चों के साथ बोल-बोल कर याद करने में एक लयात्मकता बनती है| इस लय में नवल-चंचल भी मस्त हो गये| ताली बजाकर, नाच नाच कर बच्चे पहाङे याद कर लेते हैं|  वर्ग सिखाने का और अलग अलग सँख्या के वर्ग याद रखने का यह सरलतम और रोचक तरीका है| हर पहाङे का अन्तिम पद्य बोलते समय बच्चे अतिरिक्त उत्साह में होते हैं| ऊर्जा अपने ऊफ़ान पर होती है| लगभग उछलते हुये चिल्लाते हैं- ढाये-ढाये सौ पूरा|
“ ताईजी! सौ होने पर पूरा हो जाता है ना!” एक बच्ची कनक ने पूछा|
“ हाँ बेटा! सौ में पूरा हो जाता है|” ताई का जबाब|
“ तो फ़िर आगे पढाई का क्या मतलब? पूरा हुआ, बात खतम!” कनक का दूसरा प्रश्न|
ताईजी शान्त| मुस्कुरा भर दीं|
बच्चे कैसे कैसे प्रश्न पूछते हैं| आनन्द आ जाता है| घर की हर बहू इन बच्चों की ही कक्षा लेना पसन्द करती है| इनके प्रश्न बहुत मासूम होते हैं|
लेकिन इन मासूम प्रश्नों के उत्तर तो देना ही है|
आज इन बच्चों के प्रश्नों का उत्तर दे दो, तो ये अपनी समस्याओं के उत्तर खुद ढूँढ लेंगे|
न दो उत्तर, तो ये खुद एक बङा प्रश्न बन जाते हैं|
स्वयं अपने लिये भी, परिवार और समाजके लिये भी|
उत्तर अभी देना है या बाद में, यह तो शिक्षक/ अभिभावक तय कर सकता है, किन्तु उत्तर का सही होना आवश्यक है| बच्चों में सही के स्वीकार की नैसर्गिक वृत्ति होती है| उसे बहलाने के लिये भी झूठ का सहारा नहीं लेना है, यह बाबा के परिवार में सबको स्वीकार हुआ है|
कनक के अटपटे प्रश्न का सही उत्तर क्या हो?
ताई को उत्तर ना सूझा| कनक को बहलाया भी नहीं|
ताई बोली, “ सौ पूरा तो है कनक, फ़िर भी आगे चलकर देखते हैं, क्या होता है| तुमको ना जचे, तो बताना कनक| हम मिलकर बाबा से पूछ लेंगे|”
“ठीक है ताईजी|” कनक ने सहजता से हामी भर दी|
कनक के साथ कक्षा के सभी छात्रों ने भी ताईजी की सहजता को देखा/ परखा|
हर मानव दूसरे मानव के आचरण का मूल्याँकन/ समीक्षा करता ही है| बच्चा क्या-बङा क्या!
कक्षा ने अंको का अगला पहाङा दोहराना शुरु कर दिया-
इग्यारियाँ इक्कीसा सौ – इग्यारियाँ इक्कीसा सौ|
बारम-बार चम्बाल सौ – बारम्ब-बार चम्बाल सौ|
तेरम-तेर उन्सट्ठी सौ – तेरम-तेर उन्सट्ठी सौ|
चौदह-चौकी छिनवैं सौ – चौदह-चौकी छिनवैं सौ|
पनैरियो-पनैरियो दो सौ पच्चीसौ –
पनैरियो-पनैरियो दो सौ पच्चीसौ|
सोळियो – मोळियो दो सौ छप्पन्नो –
सोळियो – मोळियो दो सौ छप्पन्नो|
सतेरियो मतेरियो दो सौ नयासी।
सतेरियो मतेरियो दो सौ नयासी।
अट्ठारियो-मट्ठारियो तीन सौ चोईसो।
अट्ठारियो मट्ठारियो तीन सौ चौईसो।
उगनीसौ- पुगनीसौ तीन सौ  इकसट्ठी।
उगनीसो-पुगनीसौ तीन सौ इकसट्ठी।
बीसम-बीसी चार सौ – बीसम-बीसी चार सौ|
बच्चों का उत्साह आसमान छू रहा था| सब ताली बजा-बजा कर झूमकर गा रहे थे| इस मस्ती में अनजाने ही गणित के जटिल सूत्र कंठस्थ भी किये जा रहे थे| “कैसा लगता है कनक?” ताईजी ने पूछा|
“ बहुत अच्छा| मजा आ गया ताईजी|” – चहक कर बोली कनक|
“ तो सौ से आगे चलना ठीक रहा कि नहीं?” – ताईजी को जैसे प्रश्न का हल मिल गया|
बच्चे प्रश्न करते हैं, तो उत्तर भी देते हैं, यह बात ताईजी ने सीखी| बाबा की यह बात भी पुष्ट हुई कि जब तक मानव नया सीखता रहता है, तब तक उत्साह की नई-नई लहरों पर झूलने का सुख पाता है|

सात
 सरपंच के घर बैठक आयोजित थी| गाँव में जो-जो तेल चुराकर बिक्री किया करते हैं, उनको बुलाया गया| स्त्री-पुरुष मिलाकर बाईस जन आये| सबके आने के बाद श्रेया ने कहा, “ आप लोगोंकी सहायता चाहिये|”
सब चौंक गये| तेल-चोरों से सहायता?
हाँ! सहायता| आप सब जितना तेल निकाल सकते हैं, उतना ज्यादा तेल निकाल लें| स्वयं के घर के सारे टैंक भी भर लें, अपने मित्र-पाङौसी और समबन्धियों के घर के सारे बर्तन भर-भर कर रख लें| यह सारा काम जितना जल्दी करें, उतना अच्छा!” श्रेया ने कहा|
“क्यों? क्या देर होने से पुलिस का डर है?” एक ने ढीटता पूर्वक पूछ लिया|
“और आप हमें चोरी करने की बात क्यों कह रहे हैं?” दूसरा बोला|
“आपने कैसे मान लिया कि आप हमें कुयें में कूदने को कहेंगे, और हम कूद जायेंगे?” तीसरा बोला|
“ चोरी के इल्जाम में पुलिस हमें पकङेगी, जेल हमें जाना होगा… आप ऐसा क्यों कर रहे हैं बहन?” चौथा ग्रामीण बोला|
श्रेया ने देख लिया कि यहाँ कोई एक भी यह बात मानने को तैयार नहीं है| चोरी-चोरी रोज तेल निकालने वाले भी आज ईमानदारी/ साहूकारी दिखाने को ऊतावले से लग रहे हैं| दूसरी तरफ़ अभिषेक की हिदायत है कि किसी भी स्तर पर जबरदस्ती नहीं करनी है|
हर मानव सही करना चाहता है, सिर्फ़ मजबूरी में भ्रमवश ही गलती करता है|
सदा के चोर भी आज गलती के लिये तैयार नहीं हो रहे हैं| अब श्रेया कैसे समझाये कि आज यह गलती गलती नहीं, बल्कि न्याय है|
हारकर उसने अभिषेक का बताया रास्ता लिया| कहा उसने- “ मैंने आपसे कहा कि हमें आपकी सहायता चाहिये| अभी जयपुर सहित हजारों गाँवों को बचाने का एकमात्र रास्ता यह है कि हम उन टैंकरों को खाली कर दें| चारों तरफ़ नब्बे स्थानों से यह काम होने वाला है| सब गावों में हमारे आदमी यही निवेदन कर रहे हैं| पुलिस बाधक ना बन सके ऐसी व्यवस्था हमने पहले ही कर दी है| अब सारी बात आप पर निर्भर करती है| आप लोग जितनी जल्दी पेट्रोल निकाल सकते हैं, निकाल लें| हज्जारों जानें बचेगी| लाखों लोग बीमार होने से बचेंगे| हमारी फ़सलें बचेगी, धरती बचेगी, हवा प्रदूषित होने से बचेगी|”

उसी समय टीवी पर समाचार आया, “ जयपुर के कमिश्नर का किन्हीं अज्ञात लोगों ने अपहरण कर लिया है| सारा पुलिस-प्रशासन सकते में है|”
श्रेया ने बताया कि यह अपहरण इसलिये किया गया है कि जयपुर की सारी तहसीलों के दो-तीन सौ गावों में चल रही तेल-चोरी को रोकने पुलिस ना आ सके| “ कमिश्नर के आदेश बिना पुलिस अपने-आप हरकत में नहीं आती| वैसे भी शासन का सारा ध्यान अभी आग की तरफ़ लगा है| नई व्यवस्थायें बनने तक हमारा काम हो जायेगा|”
“ लेकिन मीडीया को कैसे रोकेंगे दीदी|” गाँव के एक चतुर किशोर ने धीरे से पूछा|
“मीडीया को हर्गिज नहीं रोकना है| बल्कि जितनी जल्दी मीडीया आ जाये, उतना हमारा काम आसान हो जायेगा|” श्रेया ने भी धीरे से बता दिया|
“ वो कैसे?” – किशोर इस पहेली को ना समझ सका|
“मीडीया लोगों तक यह खबर पहुँचा देगी कि इतने सारे स्थानों से तेल निकाला जा रहा है| आम आदमी तत्काल समझ जायेगा कि यह सब आग बुझाने के लिये हो रहा है| शासन नहीं समझेगा| शासन-प्रशासन को वैसे भी सही समझ नहीं हुआ करती|” श्रेया की इस बात पर सारे मुस्कुरा भर दिये|
श्रेया और उसकी पूरी टीम के लिये सबके मनमें श्रद्धा का भाव बना| सबको आश्चर्य हुआ कि किशोर उम्र के लङके-लङ्कियों ने उस समस्या का सामना करना स्वीकारा, जिसे प्रदेश के मुख्य-मंत्री ने असंभव बता कर भगवान भरोसे छोङ दिया|
“ लेकिन दीदी! यह काम गैर-कानूनी नहीं है क्या?” एक लङकी ने पूछा|
“ पहले आग बुझ जाये, फ़िर तुम्हारे इस प्रश्न पर भी विचार कर लेते हैं| ठीक है ना?” श्रेया के इस कौशल और धैर्य पर सभी खुश हो गये|

आठ
आदेश्वर नवीं कक्षा में पढता है, भारती आठवीं की छात्रा है| आठवीं और नवीं की कक्षायें अलग-अलग घरों के दालान में विषयानुसार अलग-अलग समय पर लगा करती हैं| गाँव में एक भी विद्यालय भवन बना हुआ नहीं है| सारे बच्चे घरों के दालानों में बैठकर अपने अभिभावकों से पढते हैं| अध्यापक और छात्रों के बीच पारिवारिक आत्मीय रिश्ता है, अतः किसी प्रकार की फ़ीस या वेतन का कोई झंझट ही नहीं| कक्षाओं का समय भी परस्पर सुविधा पूर्वक तय कर लिया जाता है| साप्ताहिक छुट्टी का कोई विधान भी नहीं है, बल्कि छुट्टियाँ गाँव की आवश्यकतानुसार सामूहिक सहमति से तय होती हैं| वर्षाकाल में सारे छात्र और अभिभावक खेती में व्यस्त होते हैं, अतः औपचारिक रूपसे लगने वाली कक्षायें स्वतः स्थगित रहती हैं|
पूरा गाँव एक बङे परिवार की तरह है| नव-युवा लङकी-लङकों के बीच भाई-बहन का रिश्ता और स्नेह सम्बन्ध स्वाभाविक ही है, अतः रिश्तों को लेकर कोई उलझन बनती ही नहीं|  इसी प्रकार परिवार भाव के कारण गाँव में लङाई-झगङे नहीं, चोरियाँ नहीं| न्यायालय की बात तो दूर, पुलिस का भी कोई काम नहीं है औसान गाँव में|
गाँव में नियमित चलने वाली कोई दूकान भी नहीं है| पास के गाँव में साप्ताहिक हाट लगती है| गाँव भर में जरूरत की सारी चीजों की सूची बनाकर एक-दो जन जाकर सामान ले आते हैं, सबको मिल जाता है| वैसे दैनिक जरूरत के खाने-पीने-पहनने रहने आदि के सारे सामान गाँव में ही उत्पादित होते हैं| धान-सब्जियाँ-फ़ल ही नहीं, दालें और मसाले भी गाँव में ही बनते हैं| तीन-चार घरों में चरखों पर पर सूता बनता है, तो गाँव में ही तीन हाथ-करघे सबकी जरूरत के वस्त्र तैयार कर देते हैं| लोहार, सोनार, लकङी-काम के खाती, मशीन ठीक करने वाले, सब औसान गाँव में उपलब्ध हैं| किसी भी काम के एवज में धन देना-लेना नहीं पङता, इसलिये १४-१५ वर्ष तक के बच्चों को पता ही नहीं होता कि पैसा क्या होता है, किस काम आता है|
सामान्यतः सारे ही किसान परिवार हैं| बारिश के मौसम में सारे खेत एकसाथ जोते जाते हैं| गाय-आधारित रहन-सहन के कारण जैविक खेती होती है| बैलों के गले की घंटियाँ और नये रचे जाते लोकगीतों पर झूमते युवा जन महौल को स्वर्गीय आभा देते हैं|
इसी प्रकार गाँव के किसी भी घरमें कोई खुशी या गम का अवसर हो तो अवसरानुसार कुछ कक्षायें स्थगित हो जाती हैं| किसी छात्र को सामान्यत: आकस्मिक छुट्टी की आवश्यकता नहीं होती, न ही किसी को पढाई से अरूचि बनती है|
गाँव की शिक्षा-समिति विचार-विमर्ष पूर्वक पाठ्यक्रम तय करती है| प्रदेश की सभी शिक्षा-संस्थानों के पाठ्यक्रम देखा जाता है| सभी की प्रतियाँ पुस्तकालय में उपलब्ध कराई जाती हैं| अन्तरताने पर सम्बधित कक्षा से जुङे सन्दर्भों की सूची सबको उपलब्ध है| पुस्तकालय में ही पर्याप्त संगणक छात्रों  की पढाई के लिये उपलब्ध हैं| नवमी-दशमी के वरिष्ठ छात्र और इस विधा में दक्ष अभिभावक निश्चित समय पर छात्रों की सहायता के लिये उपलब्ध रहते हैं| सबका साझा प्रयास  रहता है, कि सारे छात्र शत-प्रतिशत दक्षता के साथ आगे की कक्षा में प्रवेश लें|
माध्यमिक बोर्ड परीक्षाओं की तर्ज पर त्रैमासिक/ छ:माही या सालाना परीक्षायें नहीं होतीं| हर स्तर पर छात्रों की प्रगति की समीक्षा गाँव की शिक्षा-समिति विषय-अध्यापक के साथ बैठकर हर महीने करती है|
इस समीक्षा के दौरान प्रत्येक छात्र की रुचि-अरुचि को जानकर उसी अनुरुप छात्र का आगे का मार्गदर्शन किया जाता है| छात्र की प्रगति किसी भी आयाम में मुद्रा से सम्बन्धित/प्रभावित नहीं है, इसलिये शिक्षा को लेकर किसी प्रकार का विवाद बनता ही नहीं| किसी समस्या विषेश का निदान बाबा से ले लिया जाता है|

बारवीं बोर्ड की परीक्षाओं में प्रति-वर्ष १०-१२ विद्यार्थी बैठते हैं| पास के गाँव का उच्च-विद्यालय औसान गाँव के छात्रों को बहुत आग्रह और सम्मान पूर्वक अपने विद्यालय के कोटे से परीक्षा का अवसर देता है| कहना न होगा कि इस पूरी प्रक्रिया से सम्बन्धित शिक्षा का हर विभाग प्रसन्नता और गौरव पाता है, इसका सारा श्रेय औसान गाँव की शिक्षा-व्यवस्था को मिलता है|

नौ
पूरा देश चौंक गया|
मीडीया ने इस पूरी योजना को तार-तार खोलकर जनता के सामने रख दिया| सारे चैनल इसी बात को अलग-अलग जगह से अलग-अलग आयाम में दिखा-सुना रहे हैं| कमिश्नर का अपहरण कम महत्व की घटना बन गई| सबका आकर्षण जगह-जगह निकाले जा रहे तेल पर बना है| आम जन अपने आप समझ गया कि व्यापक पैमाने पर खुलेआम चल रही यह चोरी इस भयंकर आग पर काबू पाने के लिये है| मीडीया ने भी जनता के स्वर में स्वर मिलाया| शासन-प्रशासन के लिये आम जनता में पहले से ही उपेक्षा भाव बना हुआ था| वह उपेक्षा-भाव इस समय कहीं घृणा तो कहीं हास्य-मखौल पैदा कर रहा है| मोबाईल पर इस घटना को लेकर एस|एम|एस| की बौछारें हुई| कुछ बानगी …|
एक – “मुख्यमंत्री ने अच्छा किया जो जल्दी ही हमें भगवान भरोसे छोङ दिया| सरकारी चाल से चलते तो भगवान के दरबार में अर्जी पहुँचते-पहुँचते जलकर भस्म हो गया होता राजस्थान| भगवान ने तत्काल भेज दी अपनी फ़ौज|”
दो- जैसे अयोध्या में कारसेवा करने हनुमानजी की सैना जमीन से पैदा हो गई, वैसे ही सैंकङों स्थानों पर जाने कहाँ से आ गये ये देवदूत!”
तीन – god helps them, who fail to help themselves|
चार – बधाई! सौ से ज्यादा मुख्य-मंत्री मिल गये प्रदेश को|
पाँच – केन्द्रीय गृहमंत्री का बयान है कि इस गैर-कानूनी काम में पाकिस्तान का हाथ है|
छ: – मुख्य-मंत्री के बयान से शर्मिंदा कमिश्नर ने खुद ही अपना अपहरण करवा लिया|
सात –
इस सारे प्रचार-क्रम को मीडीया ने शत-गुना कर दिया| दैनिक पत्रों ने अपने विशेष अंक छापकर आग-तेल-चोरी और सरकारी जहालत पर किस्सा-गोई की| इलेक्ट्रोनिक-मीडीया की तो निकल ही पङी| सँवाददाताओं और कैमरा-टीमों में उत्साह और जोश बढ-चढ कर बोल रहा है| सिर्फ़ समाचार चैनल ही क्यों, हास्य-चैनल और काव्य चैनल भी इसी प्रकरण पर आशु-रचनायें प्रस्तुत कर रहे हैं|
घणी-घणी खम्मा म्हारै मूरख-मंत्री न।
जै जैपर मां आग लगाई जी ओ।
जै अफ़सरङा री फ़ौज जुटाई जी ओ।
अफ़सर सारा ही छंटेल भेळा करिया जी ओ।
अफ़सर आगै बैठ हाथां न तपाया जी ओ।
अफ़सर सागै-सागै गीत गावण लाग्या जी ओ।
मंत्री अफ़सरङा न धमकावण न लाग्या जी ओ।
मंत्री आकळ-बाकळ होकर नाचण लाग्या जी ओ।
मंत्री …   …   …   …

राजनैतिक महौल भी गर्मा गया है|
शहर-गाँव सब जगह धरने प्रदर्शन हो रहे हैं|
काँग्रेस के सारे विधायक दिल्ली जाकर दबाव डाल रहे हैं, कि इस अकर्मण्य सरकार को तत्काल बर्खाश्त किया जाये|
भाजपा के सहयोगी दल किनारा कर गये|
कुछ भाजपा विधायकों की अन्तरात्मा इसी समय जागी, और वे दल-बदल कर काँग्रेस में शामिल हो गये|
भाजपा हाई-कमान ने भी नजरें फ़ेर लीं|
दस
 
कमिश्नर माथुर का अपहरण खुद उनकी छोटी प्यारी साली की मदद से वैदेही ने किया| वैदेही की सह-पाठी है मेनका| संयोग से वह भी जयपुर में है, श्रेया की शादी में दोनों सहेलियाँ पच्चीस साल बाद वापस मिलीं| मेनका ने जाना कि वैदेही औसान गाँव में रहते हुये भी कल्याण-आश्रम की प्रदेश-कार्यकारिणी में है और कल्याण-आश्रम विश्वका सबसे बङा जनजातीय संगठन है, तो मेनका अपनी सारी दौलत और सामाजिक सम्मान को लिये-दिये छोटी हो गई थी| उसके मन में आया कि “ काश मुझे भी ऐसा अवसर मिला होता|”
जयपुर आने से पूर्व ही वैदेही ने मेनका से फ़ोन-सम्पर्क कर लिया| हवाई-अड्डे से सीधा मेनका के घर जाकर वैदेही ने आग-प्रकरण में मेनका की सहायता माँगी|
“समय का तकाजा है मेनका| कोई सवाल मत करो, मेरा भरोसा करो कि चौबीस घंटों में आग पर काबू पाने में अकेली बाधा मिस्टर माथुर हैं| व्यवस्था की जकङन में अभी उनको समझाया नहीं जा सकता| तुम उनको अकेले पक्की-ढाणी के गेस्ट-बंगले में बुला लो| वहाँ उनको सारी योजना समझा दी जायेगी| उनकी मदद से ही हम आग पर काबू पा सकेंगे|”
मेनका इस रोमाँचक प्रस्ताव को भला कैसे टालती|

वैदेही की असली परीक्षा पक्की-ढाणी के एकान्त बँगले में है| बँगला चारों तरफ़ से अभिषेक की टीम की निगरानी में है| श्रेया की चार सहेलियों ने कमिश्नर साहब को कुर्सी पर आरामदेह मुद्रा में बाँध दिया| मेनका पहले से विश्वास में ले ली गई| वैदेही के साथ मेनका को देखकर माथुर साहब को आश्चर्य भी हुआ, आश्वस्ति भी|
“यह क्या नाटक है मेनका?”
“आपके पूरे सेवाकालका सबसे महत्वपूर्ण काम आपसे करवाना है जीज्जाजी!” मेनका थोङा इठला कर बोली, तो वैदेही भी मुस्कुरा पङी|
“वैदेही! तुम्हारी  मुस्कान में जादू है| सरलता,गरिमा और प्रभावशीलता का अद्भुत मिश्रण है यह मुस्कान| एक बार तो घोर शत्रु को भी आश्वस्त कर सकती है|” मेनका अक्सर कहा करती है|
वैदेही की मुस्कान देखकर माथुर साहब चौंके|
प्रतिभाशाली आइ|पी|एस| हैं, पलभरमें जान लिया कि मेनका ने इनके प्रभाव में ही मेरा अपहरण करवा लिया है| लेकिन सहज में कैसे हार मान लेते?
“आपको पता भी है कि आप क्या कर रही हैं? पुलिस दो घंटे में यहाँ पहुँच जायेगी|” कमिश्नर साहब रौब से बोले|
“ आपसे बात करने के लिये इतना समय पर्याप्त होगा|” वैदेही ने उतनी ही सहजता से प्रत्युत्तर दिया|
“बात तो घर पर भी हो सकती है, मुझे बंधक बनाये बिना भी हो सकती है| यह बात का कौन सा तरीका है?” माथुर साहब ने रौब दिखाया|
“इस रौब को जरा कम करें तो हम मूल बात पर आवें|” वैदेही का आत्म-विश्वास देखकर कमिश्नर साहब की साहबी ढल गई|
यह भाँपकर वैदेही ने पांसा फ़ेंका, “आपकी सबसे बङी समस्या का हल मिल सकता है माथुर साहब!”
“क्या मतलब?” कमिश्नर साहब अपनी चाल चलने से पूर्व भाँपना चाहते हैं कि खिलाङी कितना पानी में है|
“कैसे कमिश्नर हैं आप! अपनी समस्या स्वीकरना भी नहीं चाहते? इसमें भी दाँव-पेंच! इसी दाँव-पेंच में अटका है समस्याओं का हल|” वैदेही अडोल बैठी है| मेनका का मन हुआ कि अपनी इस सहेली पर हजार जान कुर्बान हो जाये| वह कल्पना के सातवें आसमान पर सवार देख रही है कि आग बुझने के बाद राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मीडीया वैदेही के साक्षात्कार ले रही है, और वैदेही सारा श्रेय अपनी सहेली मेनका को दे रही है| मेनका की मदद के बिना इतना महत्वपूर्ण कार्य कैसे हो पाता|
माथुर साहब ने हथियार डाल दिये, “ क्या आप आग पर  काबू पाने की बात कर रही हैं?”
फ़िर मुस्कुरा दी वैदेही|
मेनका को टी|वी| चालू करने का इशारा किया|
हर चैनल पर तेल-चोरी की खबरें चल ही रहीं थी|
आइ|पी|एस| अधिकारी को दो मिनट भी नहीं लगे| सारी योजना का सही अनुमान लगाकर बोले, “ मुझे इसलिये उङा लिया ताकि पुलिस इनको ना रोक सके| आप अभी बच्ची हैं| कमिश्नर का अपहरण केन्द्र सरकार को चुनौति है| मुझे फ़िर भी तीन-चार घंटों में खोज ही लिया जायेगा| और आपका यह गैर-कानूनी अभियान बन्द कराने में मुझे ज्यादा समय नहीं लगेगा|” माथुर साहब ने अपना विभागीय सच बता दिया|
“ जी हाँ! इस देश का बच्चा-बच्चा जानता है आप लोगों का हुनर और कौशल! देख लीजिये, बच्चों का भेजा एस|एम|एस…||” कहकर मेनका ने अपना फ़ोन जीजाजी के सामने कर दिया|
“ वे सिर्फ़ रिश्वत-भ्रष्टाचार में ही माहिर नहीं है, बल्कि हर अच्छे/सच्चे कार्य को होने से रोकने में भी उतने ही माहिर हैं – प्रशासनिक अधिकारी|” एस|एम|एस पढकर माथुर साहब मुस्कुराये|
“जानते हैं, यह किसने बनाया है?” वैदेही के प्रश्न से कमिश्नर साहब की मुस्कान बुझ गई| फ़ोन फ़िर से देखा| यह तो उनकी नन्हीं दौहित्री श्रेयस्विता ने बनाया है| लगा कि उनके पैरों के नीचे किसी ने जमीन खींच दी हो| उनका सीना जलने लगा|
“ यह आग बुझ सकती है जीजाजी| आपकी मदद के बिना भी काम तो हो जायेगा| अब आपको तय करना है कि अपनी श्रेयस्विता का खोया विश्वास फ़िरसे पाना है या नहीं” मेनका के बदले स्वरूप को देखकर माथुर साहब तो चौंके ही, वैदेही भी खुश हो गई|
“बाबा सच कहते हैं| हर मानव सही का हामी है, सही ही करना चाहता है|”
मेनका का यह भाव उसके जीजाजी पर कितनी देर में पहुँचता है, यही देखना बाकी है|
ग्यारह
 “बाबा से बात कराओ|” फ़ोन पर विक्रम ने सुना| विक्रम ने अनुमान लगाया कि यह बदहवास आवाज केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री की है|
“कहिये मंत्री महोदय! अब क्या परेशानी है?” विक्रम ने स्थिरता पूर्वक पूछा|
“अरे यह क्या हो रहा है? बाबा क्या मुझे इस्तीफ़ा ही दिलाना चाहते हैं?” दिल्लीसे गृह-राज्य-मंत्रीका ही फ़ोनहै| “ और तुम कौन बोल रहे हो?” मंत्री जी ने बदहवासी में बिना जाने ही अपना दर्द उगल दिया|

विक्रम के होठों पर मुस्कान तैर गई|- अभिषेक भैया ने ठीक ही कहा है कि सारे ऊँचे पदों पर अयोग्य लोग भर गये हैं| इनको खुद पता नहीं चलता कि कब क्या करें, कब क्या बोलें|
“ सारा काम सही हो रहा है| अभी आठ-दस घंटे इन्तजार के सिवा आपको कुछ नहीं करना है| आप निश्चिन्त रहें|” विक्रम ने अपना नाम बताना भी जरूरी नहीं माना|
मंत्री महोदय पहले से जानते हैं कि ऐसे अवसर पर बाबा से बात उनकी मर्जी से ही हो सकती है| बाबा ने अपना मोबाईल जिसे थमाया, वही बाबा का आदेश बताने का अधिकारी है|
“ केन्द्रीय मंत्री बनने की जगह बाबा का सचिव बनना ज्यादा सार्थक है|” मंत्रीजी ने मन ही मन कहा|
बाबा का सीधा संदेश सुनकर मंत्री महोदय और घबरा गये|
“लेकिन कमाण्डो-दल को मैं नहीं रोक सकता| आखिर एक आइ|पी|एस| का अपहरण हुआ है| पूरी व्यवस्था को चुनौति है यह|” मंत्री घिघियाकर बोला|
“व्यवस्था या अव्यवस्था? जरा सोचकर बताना|” विक्रम का सीधा प्रश्न मंत्री-महोदय को पसन्द तो कैसे आता, पर वे क्या करते? वे तो इस भ्रम से बने तन्त्र के एक पुर्जे मात्र हैं| अपने आपको कितना ही तोप क्यों ना माने बैठे हों, आज तो गाँव के एक किशोर से  भी रिरियाकर बात करनी पङ रही है|
“ खैर, व्यवस्थायें सारी ठीक हो रही हैं| आप यह बता दीजिये कि सेना ने अपनी कौन सी टुकङी को इस अभियान पर भेजना तय किया है|?” विक्रम ने भावी बाधा का अनुमान लगाकर उसके निराकरण की कामना से जानना चाहा|
मंत्री महोदय को लगा कि बाजी जीतने का यह अवसर हर्गिज नहीं छोङना है| आवाज में प्यार सहित रौब लाकर बोले, “ अरे यार! तुम तो मुझे अपना नाम तक बताने को तैयार नहीं, और एक केन्द्रीय मंत्री से ऐसी गुप्त सूचना पाना चाहते हो…||कुछ तो रहम करो भाई!”
अब विक्रम गंभीर हो गया| ’एकदम अनाङी है यह मंत्री! खुद ही अपना आपा दे रहा है| विदेशी गुप्तचर बहुत आसानी से इससे जो चाहे जान लेते होंगे”
प्रकट में बोला, “ कोई बात नहीं| आप मुझे अपना राजदार ना बनायें| मैं तो यह कहना चाहता था कि इस कार्य के लिये राजपूताना टुकङी को भेजना ज्यादा ठीक होगा| वे कमिश्नर साहब को जल्दी खोज सकते हैं| वैसे आपकी मर्जी|”
“ अपने आपको बहुत स्मार्ट समझते हो! क्या यह बात तुम्हारे ही मगज में आ सकती है, हमारे भी दिमाग है| क्या हम इतना भी नहीं जानते?” मंत्री महोदय फ़िर गच्चा खा गये| विक्रम को आवश्यक जानकारी मिल चुकी है| अब आगेका काम आसान है| विक्रम ने अपने ही गाँव के राजीव ताऊजी को फ़ोन मिलाया|
“ताऊजी! आपको तो पता है कि अभिषेक भैया ने|| ”
“हाँ बेटा! टी|वी| पर चल रही सारी बातों को देखकर ही जान गया हूँ…| अभिषेक अभी कहाँ है? उसको आशीष दे दूँ| औसान का सिर ऊँचा कर दिया…|” राजीव ताऊजी के आशीष को बीच में ही काटकर विक्रम ने अपना मन्तव्य कहा-
“ अभिषेक भैया ने आपसे एक मदद चाही है ताऊजी! राजपूताना राईफ़्लस के हवलदार दीवानसिंह से आपकी अच्छी दोस्ती है| अभिषेक भैया अभी उनसे बात करना चाहते हैं|”
“ क्या परेशानी है बेटा! अभी करा देता हूँ| इस काम में तो मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ बेटा! … और मैं दीवान से कह दूँगा कि अभिषेक की हर बात बिना कुछ सोचे-विचारे मान ले| यारी है हमारी| वह मेरी बात मानेगा| खुद बात करेगा अभिषेक से| कहना कि जरा भी परेशान ना हो, यह काम हो गया समझे|”

विक्रम ने मंत्रीजी से प्राप्त सूचना और राजीव ताऊजी से हुई बात फ़ौरन अभिषेक को बताई| बाकी सब तरफ़ के समाचार यथासमय अभिषेक के पास आ ही रहे थे|
अगले सात मिनट अभिषेक ने वैदेही चाची से बात की| कमिश्नर साहब की बदलती मन:स्थिति जानकर संतोष हुआ, किन्तु दिल्ली से आती सहायता का मुँह मोङने से पहले बाबा से परामर्श करना उचित माना|
बाबा को सारी बात बताई|
“ आदेश्वर से पूछो कि इस गति से टैंक खाली होने में अभी कितना समय लगेगा?” बाबा ने कहा|
आदेश्वर संभवत: इसी गणना में लगा था|
“तीन से चार घंटा समय लगेगा, यदि तेल निकालने का यह क्रम अबाधित रहे|” आदेश्वर ने पूरी बात बता दी|
“ इससे जल्दी कमिश्नर मुक्त नहीं कराये जा सकते, और न ही कोई अन्य बाधा संभावित है| क्या हमें हवलदार दीवानसिंह से किसी मदद के लिये कहना चाहिये?” अभिषेक ने बाबा से पूछा|
“ अपने प्रयत्न में कोई भी कोना अनछुआ क्यों छोङें? राजीव के प्रयत्न का भी मान करना चाहिये| तुम बात करो, जानो कि हवलदार दीवान सिंह स्वयं इस टुकङी के साथ जा रहे हैं, या उनका कोई मित्र/बन्धु जा रहा है?” बाबा ने कहा|
“ ठीक है बाबा! … आप उचित समझें तो हवलदार साहब से आप बात करें| मेरा उनसे अभी परिचय भी नहीं है| और मैं यह भी तय नहीं कर पा रहा हूँ कि सेना को अपने कर्तव्य से हटकर कोई काम के लिये कहना चाहिये या नहीं ” अभिषेक ने अपनी कठिनाई कही|
“ठीक है अभिषेक! फ़ोन आये तो मुझसे बात कराना|” बाबा ने निश्चय पूर्वक कहा|
बारह
 कक्षा पूरी करके नवल ने फ़िरसे अन्तरताना खोल लिया| नाश्ता करके चंचल भी उसके साथ आ बैठी| नवल का नाश्ता बेला दादी से कहकर यहीं ले आई| घर ही क्यों, पूरे गाँव में सारे जन जयपुर से सम्बन्धित सारी घटनाओं के प्रति उत्सुक हैं| हर प्रकार के सहयोग के लिये तत्पर भी|
“ तुम जयपुर पर अटके मत रहो, मुझे पैंटिंग करनी है| लेपटोप मुझे दो|” चंचल ने अपने छोटे भाई से कहा| चंचल सिर्फ़ एक महीना बङी है नवल से, लेकिन स्वयं को दीदी समझती है|
“क्या दीदी, तुमको पैंटिंग की पङी है| सारा गाँव जयपुर की खबर के लिये जाग रहा है| आज दोपहर में कोई नहीं सोया| देखो जरा, याहू की मुख्य पृष्ठ के पाँचों शीर्षक जयपुर से ही हैं ” नवल ने चंचल को लेपटोप देने में आनाकानी की|
चंचल की तेज नजरों ने पकङ लिया कि याहू पर अन्तिम पाँचवाँ शीर्षक जयपुर से नहीं, बल्कि छत्तीसगढ से आया है| “ जरा छत्तीसगढ वाली खबर पर क्लिक करना नवल|” चंचल ने कहते हुये खुद ही क्लिक कर दिया|
“माओवादियों ने गृह-मंत्री का अपहरण किया|” फ़ोटो के साथ बङे अक्षरों में खबर है|
“चलो बाबा को बताते हैं” नवल ने चंचल से कहा|
“ बाबा को पता है| सुबह से लगातार बाबा अन्तरताने पर ही बैठे हैं, और आदेश्वर भैया भारती दीदी भी तो उनके पास ही हैं| सबसे बङी बात यह भी है कि आज बङी दादी ने मना कर रक्खा है| बाबा के कमरे में सिर्फ़ उनकी इजाजत से ही आना-जाना हो सकता है|” चंचल ने दीदी वाली समझदारी दिखाते हुये नवल को उत्तर दिया|
“ यह भी तो हो सकता है कि बाबा जयपुर के घटना-क्रम में व्यस्त हों| इतनी महत्वपूर्ण बात है, दादी से अनुमति मिलना क्या मुश्किल है? आप तो बस, अपनी ही बात को ऊँचा रखती हैं, बाबा मेरी बात ज्यादा मानते हैं…||” नवल थोङा नाराजगी दिखाते हुये बोला|
“ अरे भाई! व्यर्थ ही नाराज होते हो| चलो, यह बात विक्रम भैया को या अभिषेक भैया को एस|एम|एस से बता देते हैं| वे उचित निर्णय कर सकेंगे कि बाबा तक बात पहुँचानी है या नहीं|” चंचल स्नेह-पूर्वक बोली तो नवल का चेहरा खिल गया|
“ और आप जो पैंटिंग करने वाली थी, उसका क्या होगा?” नवल ने दीदी का मान करते हुये लेपटोप चंचल के लिये छोङ दिया|
तेरह
हवलदार दीवान सिंह का फ़ोन दस मिनट में ही आ गया| “ क्या आप औसान गाँव से अभिषेक बोल रहे हैं?”
“ जी हाँ! आप संभवत: हवलदार दीवानसिंह हैं!” अभिषेक ने आदर सहित अभिवादन किया|
“कहिये अभिषेक!” वैसे सिविलियन के साथ किसी प्रकार की कार्य-योजना से जुङना हम मिलीट्रीयन्स के लिये संभव नहीं होता| पर तेजसिंहजी ने जैसा आपके बारे में बताया, उससे मेरी जिज्ञासा भी बनी है| क्या आप इतनी बङी आग को बुझा सकेंगे?” दीवानसिंह ने बातचीत सीधा मुद्दे पर लानेमें पहल कर दी|
“जी, वह सब आप लोगों की मदद से ही पूरा होगा| संभवतः केन्द्र की पहल पर राजपुताना राईफ़ल्स के कमाण्डोज जयपुर आ रहे हैं” अभिषेक ने बिना किसी भूमिका के पूछ लिया|
“ उससे आपकी योजनाका क्या सम्बन्ध?” दीवानसिंह सारी बात स्पष्ट जानकर ही सेना की सहभागिता के बारे में विचार करेंगे, अभिषेक ने अनुमान लगाया|
“यह सारी योजना बाबा की है| आप बाबा से सीधा जान लें, इसीमें मेरा भी समाधान है| फ़ोन मैं बाबा को दे रहा हूँ|” अभिषेक की यह बात बाबा सुन ही रहे हैं| इसलिये बाबा को दीवानसिंह की उलझन समझने में जरा भी देर ना लगी|
“ कमिश्नर का पता लगाने और उनकी मुक्ति के लिये केन्द्र सेना को बुला रहा है, जबकि कमिश्नर इस आग को बुझने तक स्वयं ही छुपे रहना उचित समझते हैं| जयपुर की मुख्य चिन्ता अभी उस आग की भयावहता ही है|” बाबा ने बताया|
“जी, सच है| हम भी यहाँ यही चर्चा कर रहे हैं| और कमिश्नर से पहले तो छत्तीसगढ के गृहमंत्री का नम्बर आता है|  खैर,  यहाँ की प्रतीक्षा है…|” दीवान सिंह बाबा की बात से सहमत हुये|
व्यक्ति किसी एक जगह सहमत हो जाये, तो आगे सहमति के द्वार खुल जाते हैं| बहुत गंभीर मतभेद ना हों तो कार्यक्रम पर सहमतियाँ बन ही जाती हैं|
बाबा ने दीवानसिंह को विश्वास में लेते हुये कहा,
“ वैसे छत्तीसगढ के गृहमंत्री को तो स्थानीय सरकार छुङा लेगी| माओवादियों की माँगें मानने का राजनैतिक निर्णय पहले ही हो गया है| इस निर्णय को निर्बाध रूपसे क्रियान्वित  करने के लिये यह अपहरण प्रायोजित है| सेना को इसमें नहीं जाना होगा| हाँ, जयपुर में कमिश्नर से ज्यादा जरूरी है आग पर काबू पाना| इसमें सेना हमारी मदद कर सकती है|”
“ लेकिन बिना आज्ञा के कैसे होगा? … और आप कैसे कह सकते हैं कि कमिश्नर का अपहरण नहीं हुआ है? बात कुछ समझ में नहीं आई|” दीवान सिंह की जिज्ञासा चरम पर है|
“आपने दो समस्यायें रक्खी हैं| एक हम हल करते हैं, दूसरी आप कर सकते हैं| यदि आप कमिश्नर की आवाज पहचानते हों तो उनसे मैं आपकी बात करवा सकता हूँ| और आप चाहें तो केन्द्र की आज्ञा का पालन करते हुये बिना समय गँवाये आग बुझाने में हमारी मदद भी कर सकते हैं|” बाबा ने समाधान की दिशा बता दी|
“ आपकी बात का प्रमाण मैं नहीं माँगूगा बाबा! आप यह बताईये कि आग बुझाने में सेना क्या कर सकती है| हमारी सीमा में यही है कि हम किसी भी प्रकार कमिश्नर को खोजकर उनको सामने ला दें| बस|” दीवानसिंह ने बताया|
बाबा समझ गये कि स्वयं दीवान सिंह ही इस टुकङी का नैतृत्व करने वाले हैं| अब बात और आसान हो गई| ऐसे कार्यों में एक से अधिक व्यक्तियों का समावेश समस्या के हलमें बाधक ही बनता है|
“आप टुकङी-नायक को विश्वास में लेकर अपने हेलीकोप्टर  में आग बुझाने का पाउडर रखवा लो| जयपुर उतरने से पहले आग पर पाउडर गिरा देना, ताकि आग बुझ सके|”- बाबा ने दीवानसिंह पर यह स्पष्ट करना उचित नहीं माना, कि उनके नैतृत्व की बात भाँप ली है|
“ जी ! यह हो जाये, तो क्या कमिश्नर हमको मिल जायेगा?” दीवानसिंह ने अपनी ड्यूटी को आगे रखा|
“वह तो आपको वैसे भी मिल जायेगा| मैंने आपको बताया है कि कमिश्नर अपनी मर्जी से हमारे साथ हैं| वे जानते हैं कि अपनी ओफ़िस में रहते हुये सरकारी तन्त्र से यह आग हर्गिज नहीं बुझाई जा सकती| सरकार के लिये उनका अपहरण हुआ है, जबकि अपनी तरफ़ से वे छुट्टी का आनन्द ले रहे हैं| बस आप किसी पर उनका यह राज ना खोलें|” बाबा ने दीवानसिंह को सावधान किया|
चौदह
“आज हमारे समाज की जो स्थिति है, उस पर चर्चा करेंगे| प्रत्येक छात्र को अपनी बात कहनी है| हम समस्या को समाधान की दिशा से देखने का प्रयत्न करंगे| चूँकि हमारा देश-समाज बहुत संकट भरी स्थितियों से गुजर रहा है, मीडीया ने स्थितियों को और बङा बना दिया है|; इसलिये  कक्षा में हमने दादाजी श्री कैलाशजी को भी बुलाया है| आज की यह कक्षा विषय के स्पष्ट होने तक चलेगी| मेरा अनुमान है कि इसमें चार घंटे लगेंगे| दो घंटे बाद लस्सी-कलेवा एवं शारीरिक बाधा-निवारण के लिये १५ मिनट् का अवकाश रहेगा|” यशस्विता कक्षा के छात्रों के समक्ष भूमिका रक्खी|
यह कक्षा १० की सामाजिक-सरोकार विषय की कक्षा है| यशस्विता इस कक्षा की समन्वयक है| विषय का विवेचन सन्दर्भानुसार अलग-अलग अभिभावक करते हैं| कक्षा का स्थान, समय और अवधि निश्चित नहीं होती| समाज-शास्त्र के सभी अच्छे ग्रन्थ पुस्तकालय में उपलब्ध रहते हैं| इस कक्षा के छात्र/छात्रायें अधिकतर पढाई अन्तरताने पर कर लेते हैं| प्रदेश के विद्यालयों के पाठ्यक्रम छात्रों को नवमी कक्षा की पढाई के समय भी पता रहते हैं| पाठ्यक्रम प्रथम दो महीने में ही पूरा कर लिया जाता है| शेष समय सामाजिक-सरोकारों और देश-समाज की साम्प्रतिक समस्याओं को समझने /समझाने में लगता है|
आज का विषय और अवधि पिछले सप्ताह ही तय कर ली गई थी| इसके अनुसार आज रासायनिक क्रियाओं और भौतिक प्रयोगों के कालाँश स्थगित किये गये| इन दोनों विषयों को पढाने वाले अभिभावक/शिक्षक भी कक्षा भवन में उपस्थित हैं| औसान गाँव के ग्यारह परिवारों से कुल 26 विद्यार्थी आज उपस्थित हैं| विक्रम और कमल जयपुर गये हैं, भारती और नवमी कक्षा के आदेश्वर चूँकि बाबा के साथ लगे हैं, इसलिये इन तीनों के उपस्थित होने का इन्तजार किये बिना कक्षा शुरु हो गई|
“विषय-प्रवर्तन का क्रम क्या होगा?” कैलाश जी ने यशस्विता से पूछा|
“ हमने भारत की समस्याओं की सूची बनाई है| कुल 26 समस्याओं की सूची आपके सामने रक्खी है| आप कोई भी समस्या किसी भी विद्यार्थी को रखने के लिये कहें| वह समस्या को समाधान सहित प्रस्तुत करेगा|” यशस्विनी ने निवेदन किया|
“ उक्त समस्या पर या समाधान पर कोई प्रश्न भी रखना चाहे, तो उसका समाधान कौन करेगा?” कैलाशजी ने एक नया तर्क सुझाया|
“ जो विषय-प्रवर्तन करता है, वही प्रश्नों का उत्तर भी दे तो ठीक रहेगा|” छात्रा भाविका ने कहा| कैलाशजी ने भाविका को ठीक से पहचाना नहीं, तो यशस्विता से पूछा, “ क्यों बहू! भाविका अपने पदम-जयश्री की कन्या तो नहीं?”
भाविका ने उठकर आदर पूर्वक प्रणाम करते हुये कहा, “ हाँ बाबा! इस बार आपसे मिले दो साल हो रहे हैं| आपको श्रीचन्द काका की शादी में भी नहीं देखा| पता चला कि आप उस समय अस्वस्थ थे| मुझे आपसे मिलने आना था, भूल हुई बाबा|” ……“ खुश रहो बेटा! वह कोई भूल नहीं है| सामान्य बात है| पदम तो आता ही है| और तुमने प्रश्न-समाधान पर सही कहा|” कहकर कैलाशजी ने आश्वस्त किया|
अपने सामने रक्खी समस्या-सूची देखी और बोले, “ honour killing” पर शिल्पा अपने विचार रक्खे|”
HONOUR KILLING
शिल्पा – “यह भारतीय समाज के लिये अब तक की सबसे नई समस्या है, और अपने ताने-बाने में अन्य कई समस्याओं की संभावना को लिये चलती है| १- जाति-व्यवस्था = भारतीय समाज-व्यवस्था की सदियों पुरानी परम्परा के मर्म को बिना जाने मानते रहने का दुष्परिणाम ओनर किलिंग के रूप में सामने आ रहा है| जाति-व्यवस्था का मूलाधार खो गया तो अपनी जाति को दूसरी से श्रेष्ठ माना जाने लगा| सजातीय शादी-ब्याह उत्तर भारत में परम्परागत रूप से अवैध मानी जाती है| अब बदले माहौल में युवा लङके-लङ्कियाँ साथ पढते और काम करते हैं, तो उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध बन जाता है| परिजनों को यह सब मर्यादा-उल्लंघन लगता है| अपने मान-सम्मान(जैसा उन्होंने मान रखा है) को बचाने के लिये अपनी सन्तान की हत्या करते हैं, अथवा अपनी कन्या के  प्रेमी की हत्या कर देते हैं|
ओनर किलिंग की ज्यादा घटनायें जाटबहुल हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, मध्य-प्रदेश आदि  प्रान्तों में हुई हैं| कानून-प्रशासन, और मानवाधिकार वादियों ने इन प्रेमी जोङों के पक्ष में आवाज उठाई तो खापों और पंचायतों ने विरोध में फ़रमान जारी कर दिये| इस प्रकार कानून और समाज आमने-सामने आ गये| अब तो पचासों युवा लङके-लङकियों ने पुलिस से अपने ही माता-पिता के विरुद्ध शिकायतें दर्ज कराई हैं| समाज-शास्त्री चिन्तित हैं कि यह प्रकरण अनेक नई समस्याओं और उलझनों के जन्म देगा|”
“ आपने समस्या का समाधान नहीं सुझाया? क्या आपकी नजर में ओनर किलिंग का कोई समाधान नहीं है?” वरुण और मयंक ने पूछा|
“ दो बातें हैं- एक तो इस सृष्टि में मानव के लिये किसी समस्या की रचना नहीं हुई| सारी समस्यायें मानव के भ्रम की उपज हैं| दूसरी बात- समझ से पहले समाधान नहीं होता| इस समस्या का सही समाधान भी समझ में ही है” श्वेता ने उत्तर दिया|
“इसे जरा खोलकर बताओ श्वेता|” यशस्विता ने कहा|
“एक-एक को समझने से होगा| माता-पिता को समझ में आ जाये कि हर जीवन स्वतन्त्र इकाई है, अपने भले-बुरे की जिम्मेदारी स्वयं की है| अभिभावक सिर्फ़ समझ बनने का रास्ता बतायें, किसी अवस्था में कोई जबरदस्ती ना करे, तो बच्चे पुलिस के पास क्यों जायेंगे? इस प्रकार इस समस्या से कानून वाला पक्ष कम हो जाता है| साथही युवाओंको समझ आये  और उनको ममता,वात्सल्य,स्नेह,विश्वास आदि नौ मूल्योंका साक्षात्कार हो| वे देख पायें कि परिवार एक नैसर्गिक इकाई है, और सारे सदस्य परस्पर पूरक हैं, इनमें किसी प्रकार कोई विरोध नहीं| यह भी कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों मे मित्रता को स्थान नहीं| या तो वे परस्पर भाई-बहन होते हैं, या पति-पत्नी| शरीर को पूरा जानेंगे, तो इसका प्रयोजन भी स्पष्ट होगा कि शरीर जीवन-जागृति-क्रम में उपकरण है| स्वास्थ्य-संयम भी ध्यान में रहेगा, तो अवैध सम्बन्धों की नौबत ही नहीं आयेगी| अब बारी है खापों और पंचायतों की| वास्तव में समाज की ये संस्थायें; जो समाज के सही संचालन के लिये बनी थी, स्वयं बङी समस्यायें बन गई हैं| भ्रम इतना बङा हुआ कि अपने ही बच्चों की हत्या का फ़रमान जारी करती हैं| समझ बनी, तो ये स्वयं ही सिमट जायेंगी|” श्वेता ने अपना मत बताया|
“ तो क्या खाप-पंचायतें-पुलिस-कानून-राजनेता आदि सारे ही भ्रम में हैं… आपकी इस बात को मानेगा कौन? आपके बताये समाधान को स्वीकारेगा कौन?” यह प्रश्न स्वयं यशस्विता ने किया| कैलाश जी सब देख-सुन रहे हैं|
“ हाँ चाचीजी! मैं स्वीकार करती हूँ, कि मेरा यह तर्क बाहर कोई नहीं स्वीकारेगा| यहाँ कक्षा में समस्या की समीक्षा में यह सब कहा है| मुझे स्वीकार है कि बिना समझे समझाया नहीं जा सकता| मैं अपनी समझ पूरी करने के लिये प्रयत्नशील हूँ|” श्वेता ने सच्ची बात कह दी|
“ तो क्या समझ पूरी होने से पूर्व हम समाधान की दिशा में कुछ नहीं कर सकते? मेरे मन में आता है कि मैं इस समस्या का समाधान सुझाऊँ…||” भाविका ने अपनी बात रक्खी|
“ नहीं, समझ बनने तक वर्तमान में कार्यरत संस्थाओं को अपनी-अपनी भूमिका निभाना है| कानून अपना काम कर ही रहा है” श्वेता का कहना है|
“ तुम अपनी बात कहो भाविका! सबको जाँचने का अवसर मिलेगा कि समझ से पूर्व समाधान पाया जा सकता है या नहीं|” – यशस्विता के बारे में सब जानते हैं कि वह अपने विद्यार्थी को अपनी बात रखने के लिये सदा प्रोत्साहित करती है|
भाविका ने समस्या की परतें खोलते हुये कहा-
“समस्याकी शुरुआत युवाओंके उन शारीरिक सम्बन्धों से हुई है, जिसे परिवार और समाज मान्यता नहीं देता| अब सामाजिक मान्यतायें तो देश-काल-परिस्थिति  के साथ बदलती रहती हैं| जैसे पश्चिमी देशों में इसे युवाओं की स्वतन्त्रता कहा जाता है| उत्तर भारत के हिन्दू सजातीय विवाह के विरुद्ध हैं, जबकि इस्लाम में चचेरी-ममेरी बहन से शादी का स्वागत किया जाता है| दक्षिण भारत में भी ममेरी बहन से विवाह मान्य होता है| भारतमें तलाकशुदा लङकी पसन्द नहीं की जाती, और नाईजीरिया में तो विवाह के लिये आदर्श लङकी वह होती है, जिसके तीन-चार तलाक हो चुके हों| तो यह क्यों नहीं मान लिया जाये कि अन्य अनेक समस्याओं कीतरह इसका समाधान भी समय के साथ अपने-आप हो जायेगा| न कानून को परेशान करने की जरूरत है न हमें|”
भाविका का उत्तर पूरी कक्षा को हँसा गया|
“ हँस लिये? अब बताओ कि भाविका के उत्तर में गलती कहाँ है?” यशस्विता ने मुस्कुराते हुये पूछा|
………………|
………………|
पूरी कक्षा चुप!
यशस्विता भी चुप!
सबने कैलाश जी की तरफ़ देखा|
समस्या कहाँ से कहाँ पहुँच गई! लेकिन छात्रों के प्रश्न को अनुत्तरित तो नहीं छोङा जा सकता|
कैलाश जी ने सबको आश्वस्त करते हुये कहा, “ आगे चलते हैं| संभव है कि इसका उत्तर स्वयं निकल आये| सृष्टि में कोई रहस्य तो है नहीं|”
“अब मयंक अर्थनीति से बनती समस्याओं पर प्रकाश डालेगा|”
पन्द्रह-अर्थनीति जनित समस्यायें
मयंक – मानव के भ्रम का एक बङा केन्द्र है अर्थ| ’अर्थ’ शब्द से सामान्यत: ’मुद्रा’ का बोध होता है| मुद्रा का आविष्कार मानव ने विनिमय-सुविधा के लिये किया| आदि-मानव संभवतः वस्तु के बदले वस्तु का लेन-देन करता रहा हो| फ़िर जैसे जैसे राजतन्त्र आया, राजागण अपने नाम की धातु से बनी मुद्रायें चलाने लगे| सोना, चान्दी, ताम्बा, पीतल आदि की मुद्राओं में नकली होने की संभावनायें कम थी| कालान्तर में कागज की मुद्रा बनी| नकली मुद्रा के साथ काला-धन की नई समस्या बनी| अब प्लास्टिक से होते हुये सिर्फ़ नम्बरों के द्वारा ही (अन्तरताने पर) मुद्रा का लेन-देन होने लगा है|
मुद्रा से जुङी समस्याओं और भ्रम की सूची काफ़ी लम्बी हो सकती है| मैं कुछ बिन्दु रखती हूँ|
•    अधिक मुद्रा जमा करके अमीर बनने की होङ विश्व-व्यापी है| संग्रह स्वयं भ्रम है, भ्रमजन्य अपराध भी| विडम्बना यह है कि सारी प्रतिभायें मुद्रा-संग्रह की होङ में लगी हैं|
•    स्वयं में निर्मूल्य होकर भी सर्वोच्च स्थान पाया है मुद्रा ने| आदर्शवाद ने सदियों तक जिन मानबिन्दुओं को प्रस्थापित किया, उन सब पर हावी हुआ है मुद्रा का प्रभाव|
•    मुद्रा संग्रह के परिणाम सेक्स और हिंसा हैं|
•    मुद्रा के अधिमूल्यन से समस्त मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन हुआ है|
•    धन स्वयं धन को बढाता है, इसमें मानवीय श्रम का कोई योगदान नहीं रहा।
•    श्रमिक वर्ग अपने परिवारका पेट भी नहीं भर पाता, जबकि आँकड़ों का जोङ-घटाव करने वाले बिना श्रम के करोङों जमा कर लेते हैं।
•    वर्तमान अर्थशास्त्र मानव को संसाधन मानता है| मानव के लिये अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र के लिये मानव एक संसाधन बना है| भोपाल गेस-काण्ड गवाह है कि हजारों मानवों की अमानवीय मृत्यु होने के बाद भी मुजरिम अपने धन के बल पर साफ़ बचकर निकल गया| अर्थशास्त्र से प्रेरित बाज़ार मानव के लिये बीमीरियाँ, मिलावट और भ्रष्टाचार जनित अनेक समस्यायें खङी की हैं|
•    अर्थतन्त्र के विकास का सूचक ’शेयर’ साफ़ तौर पर जुआ है| शेयर-सूचकांक को ऊपर चढाने के लिये धरती पर अनेक प्रकार के अत्याचार चल रहे हैं| खनिज,पानी, पेट्रोल, कोयला आदि भूगर्भ-स्थित पदार्थ निकाल कर भ्रमित मानव मुद्रा-संग्रह में लगा है| वैज्ञानिक स्टीफ़न हाकिन्स सहित हजारों सुविज्ञ-जनों का आकलन है कि यह जीवन-शैली इस धरती के स्वास्थ्य के लिये जान-लेवा है, अपने सौर-मण्डल का यह सर्वाधिक विकसित ग्रह अब सौ वर्ष भी स्वयं को संभाले ना रख सकेगा। पर्यावरण बहुत तेजी से या तो बेहद गर्म होगा, अथवा बेहद ठंडा। गर्म हुआ तो उत्तरी-दक्षिणी ध्रुव अपनी चुम्बकीय शक्ति खो देंगे। इस चुम्बकीय शक्ति के दम पर ही इस ग्रह के सारे अणु-परमाणु परस्पर एकीकृत हैं, इसके नष्ट होते ही धरती धूल का एक बङा गुब्बार बनकर अनन्त अन्तरिक्ष में बिखर जायेगी। दूसरी तरफ़ यदि ठंडक बढी हो फ़िरसे हिमयुग आ जायेगा। समुद्र जमकर बर्फ़ बन जायेगा। जल के अभाव में न वनस्पति रहेगी, न जीवन की संभावना। प्रकृति को फ़िरसे अपनी विकास-यात्रा आरम्भ करनी होगी।
यह सारा दुष्परिणाम वर्तमान अर्थनीति के कारण आना संभावित है। इस अर्थनीतिने मानव को संसाधन बना दिया है। मानवीय गरिमा नीचे चली गई, पैसे का स्थान ऊपर हो गया।
वर्तमान अर्थनीति के विवेचन में कम समय लगे, यदि इस पर प्रश्नोत्तर अथवा सँवाद कर लिया जाये। मेरा प्रस्ताव है, कि अब कक्षा के सारे साथी इसके विभीन्न पहलुओं पर चर्चा आरम्भ करें।
यशस्विनी- मैं मयंक से सहमत हूँ। बाबा कैलाशजी की अनुमति हो तो चर्चा शुरु करें।
कैलाशजी- यह विषय ज्यादा लम्बा है, और बहु आयामी भी। चर्चा ही ठीक रहेगी। पर इस चर्चा से पूर्व जयपुर के समाचारों के लिये सभी की उत्सुकता होगी। टीवी पर समाचार सुन लेते हैं।
सौलह
रायपुर में अलग ही नजारा चल रहा है।
अपने गृह-मंत्री के अपहरण से शासन-प्रशासन सकते में है। सारे विधायक, सभी जिलाधिकारी, सारे पुलिस उच्चाधिकारी, सभी विभागों के मुख्य सचिव और खुफ़िया विभाग इसी विषय पर मन्त्रणा के एकत्र हैं। गये कल ही दन्तेवाङा जिले में एक वरिष्ट साहित्यकार सम्मेलन में मुख्य-अथिति के नाते उपस्थित थे। लघु-शंका निवारण के लिये मंच से लगे ग्रीन-रूमके बाथरूम में धुसे, तो वापस ही ना निकले।  सुरक्षा-कर्मियों ने दस मिनट इन्तजार किया, कि कहीं दीर्घ-शंका के लिये बैठ गये होंगे। उसके बाद दरवाजा तोङा गया, तो चमनलालजी गायब थे। बाथरूम का बाहर की ओर खुलने वाला दरवाजा बाहर से बन्द था। सुरक्षा अधिकारियों ने बाहर जाकर देखा, किसी के बाहर निकलने का कोई संकेत नहीं मिला। इसके पाँच मिनट बाद ही दिल्ली-स्थित एक राष्ट्रिय चैनल में फ़ोन पर किसी ने सूचना दी कि छत्तीसगढ के गृह मंत्री श्रीचमनलालजी का माओवादियों ने अपहरण कर लिया है।
तत्काल रेड-एलर्ट हो गया। आधे घंटे में खोजी कुत्तों का दस्ता भी आ गया। पूरे जिले को सील कर दिया गया, बाहर जाने के सारे रास्ते बन्द करके चप्पे-चप्पे को छान डाला गया, मगर चमनलालजी का कोई पता ना चला। एक घंटे बाद मीडीया पूरे देश को बता रहा है कि चमनलालजी को ढूँढ़ने का प्रयत्न उनकी जान भी ले सकता है। माओवादियों का खौफ़ सबके सिर पर पहले से ही सवार है। सरकार ने उनको खोजने की कोशिश बन्द कर दी। माओवादियों का सन्देश आ गया कि उनके सत्ताईश साथियों को मुक्त किया जाये।
यह मीटींग इसी प्रसंग में है।
“ दन्तेवाङा जैसे माओवादी इलाके में साहित्यकार-सम्मेलन  करने की राय किसने दी थी?” काँग्रेसी नेता ने सीधा मुख्य-सचिव से प्रश्न किया।
“ निर्णय खुद साहित्यकारों का था। सम्मेलन में आये अधिकांश साहित्यकार माओवादियों के पक्षधर हैं। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सम्मान करते हुये चमनलालजी ने इस तीन-दिवसीय सम्मेलन में जाना स्वीकारा।” सचिव का जवाब।
“और गुप्तचरों की जवाबदारी? उन्होंने इलाके की सही सूचनायें समय पर नहीं पहुँचाईं? या उन सूचनाओं की उपेक्षा हुई?” प्रश्न किया शिक्षा-सचिव ने।
“ यह कार्यक्रम तीन माह पहले तय हुआ था। इसके छः माह पूर्व माओवादियों के साथ नौ बङी मुठभेङें हो चुकी थी। इन मुठभेङों में उनके नौ बङे नेताओं सहित इक्कीस जन मारे गये और सत्ताईश गिफ़्तारियां हुई। सीमावर्ती मध्य-प्रदेश में हमने सुलुआ-जुङुम योजना वापस ली। देश-व्यापी इस अभियान के बाद केन्द्र सरकार और माओवादियों के बीच सुलह-वार्ता चली। इस दौरान उनके वरिष्ठ नेता आजाद की मुठभेङ में हुई मौत व्यापक विवाद का विषय बनी। तब से दन्तेवाङा सहित मध्यप्रदेश, आन्ध्रा और तमिलनाडु में माओवादी एकदम शान्त हैं। शहर में भी शान्ति है और जंगल भी घटना मुक्त हुये। जिले की गुप्तचर टोली लगातार अपनी रिपोर्ट देती है, उसको देखते हुये कार्यक्रम में किसी बाधा की आशंका भी नहीं थी। फ़िर हमारे सर्वेक्षण के उपरान्त गृह-मंत्री जी के निजी गुप्तचरों ने भी पूरे जिलेका जायजा लिया था। निजी सुरक्षा कर्मियों ने दो दिन पहले ही भवन की पूरी जाँच की थी। उस समय खोजी कुत्तों की मदद भी ली गई थी। वरिष्ठ माओवादियों में सभी के शरीर की गंध से ये कुत्ते परिचित हैं। हाल के आसपास उनमें से किसी की भी उपस्थिति पर कुत्ते भङक उठते। फ़िर गृह-मंत्री का सुरक्षा काफ़िला उनके साथ ही था। बाथरूम तक दो कमाण्डो साथ गये थे, किसी प्रकार की आशंका नहीं हुई। अगले पन्द्रह मिनट तक दोनों कमाण्डो बाथरूम के बाहर ही खङे थे। अपहरण का प्रयत्न हुआ होता तो कोई तो हलचल होती! देश के श्रेष्ठ कमाण्डो हैं दोनों- किसी भी स्थिति से निपटने में सक्षम हैं। उनकी टीम हैरत में है कि उन दोनों को विशेष जाँच प्रक्रिया से गुजरना पङ रहा है। हमको नहीं लगता कि इस घटना में गुप्तचरों या सुरक्षा-अधिकारियों को दोष दिया जा सके।” प्रदेश गुप्तचर सचिवने विस्तार से ब्यौरा दिया। इसके बाद अपहरण की पृष्ठभूमि पर चर्चा का कोई आधार बचा नहीं।
“ अब आगे हमें क्या करना है, इस पर आप सबकी राय महत्वपूर्ण होगी। विचारपूर्वक बतायें।” स्वयं मुख्य-मंत्री  ने बातचीत का सूत्र अपने हाथ में लिया।
“उनकी शर्त मान लेने से तो चारों तरफ़ थू-थू होनी है। इससे पहले आपको इस्तीफ़ा दे देना चाहिये।” विपक्ष के नेता यह कहते समय अपनी कङवाहट को छुपा भी नहीं पाये।
“ हम यहाँ राजनीति करने नहीं बैठे, ऐसी विषम स्थितियाँ हम सबके धैर्य, दूरदर्शिता और कौशल की परिक्षा लेती हैं। यही समझ लें आपपर ऐसी घङी आ पङती तो क्या करते?” गृह-सचिव ने गाङी को पटङी छोङने से बचाने की कोशिश की।
इस बातचीत में पहली बार पुलिस-सचिव ने अपनी चिन्ता बताई, “माननीय मुख्यमंत्री यदि माओवादियों की शर्त मानने की बात सोच रहे हों तो मैं बता दूँ कि उन्होंने क्या-क्या कारस्तानी की है। चार रेलगाङियों के हादसों में कुल 2374 जानें लीं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री की जान जिस हेलीकोप्टर हादसे में गई, उसमें भी इनका ही हाथ संभावित है। आइएसआई और तालिबान से इनके सम्बन्ध जाहिर हो चुके हैं। अपने आदमियों को चीन भेजकर गुरिल्ला ट्रेनिंग दिलाते हैं। ड्रग्ज माफ़िया और परमाणु-हथियारों की तस्करी में ये दाऊद के भी बाप बन गये हैं।इनको मुक्त करने का अर्थ होगा कि हम नये सिरे से विपदाओं को निमन्त्रित कर रहे हैं। इनकी गिरफ़्तारी के लिये हमको कई बेशकीमती कामाण्डोज की कुर्बानियां देनी पङी थी। उनके साथियों का मनोबल टूटेगा। नये सिरे से ऐसे किसी अभियान में उनकी भूमिका अनमनी रह जानी है। कृपया ऐसा निर्णय अपने पैरों पर कुल्हाङी मारने जैसा ही होगा।

मुख्यमंत्री- आपकी सारी बातें सही हैं, मैं भी आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। सिर्फ़ कमाण्डोज की क्यों, प्रदेश के प्रत्येक नागरिक का मन बुझ जायेगा। सरकारों का चलना और गिरना जनता के हाथमें होता है, जनता यह कभी नहीं चाहेगी कि उनकी चुनी हुई सरकार किसी के सामने घुटने टेक दे। कोई भी इस तरह का निर्णय सहज में नहीं ले सकता। इसीलिये आपको बुलाया गया है, आप लोग रास्ता दिखाइये, क्या करना है? यदि चमनलालजी की जगह मुझे अगवा किया होता, और मुझसे पूछा जाता तो मैं यही कहता कि मुझे मर जाने दिया जाये। यह बात तय है कि माओवादी उनकी जान ले लेंगे। बताइये, क्या किया जाये?
विरोधी दल का नेता- हम भले ही आपके विरोधी हैं, पर इसका यह अर्थ नहीं है कि हम किसी की जान पर आने देंगे। चमनलालजी की जान बचाने का यदि यही एकमात्र मार्ग हो…………
पुलिस सचिव – माफ़ कीजिये, मैं इससे सहमत नहीं। उनको मुक्त करने की बजाय बेहतर है कि हम उनकी ही शैली में ईंट का जवाब पत्थर से दें। एक-एक घंटे में उनके एक-एक आदमी की गर्दन काटकर भेजी जाये। इस समाचार से ही उनमें दहशत पैदा हो जायेगी।( इस प्रस्ताव पर सभी हँसते हैं) संभव है कि गृह-मंत्री महोदय थोङा-बहुत शारीरिक कष्ट दें, किन्तु जान तो हर्गिज नहीं लेंगे। इतने मूर्ख नहीं हैं वे। जानते हैं कि इसका अन्जाम क्या हो सकता है।
मुख्य सचिव- मेरा अनुमान माननीय मुख्य-मंत्री मदोदय की आशंका को सही मानता है। गिरफ़्तार माओवादी उनके संगठन की रीढ हैं। इनकी गिरफ़्तारी के बाद वे किसी नई घटना को अंजाम नहीं दे पाये, पंगु हो गये हैं। इनको मुक्त कराने के लिये अब वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। बल्कि मुझे तो यह आशंका भी है, कि चमनलालजी की हत्या करके वे पूरे शासन-प्रशासन-तन्त्र की औकात देशवासियों के सामने ला सकते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि आध्र-मुखमंत्री के हैलीकोप्टर हादसे के अपराधियों को प्रशासन अब तक पकङ नहीं सका है। हमारे तन्त्र की कमजोरियों का भरपूर फ़ायदा मिल रहा है माओवादियों को। स्पष्ट है कि यदि माननीय गृह-मंत्री के साथ भी यदि कोई अनहोनी हो जाये, तो भी प्रशासन माओवादियों को …   …”
मुख्य सचिव की बात को बीच में काटकर एक राष्ट्रीय समाचार पत्र समूह के सम्पादक बोले- “सचिव महोदय की इस आत्म-स्वीकृति से यदि माननीय मुख्य-मंत्री महोदय सहमत हों तो उनको अपने पदसे इस्तीफ़ा दे देना चाहिये…”
उनका साथ दिया एक बङे उद्योगपति ने-“और असहमत हों तो अपने सचिव को बर्खास्त करें। इस तरह का वक्तव्य पूरे तन्त्र की नाकारी और विवशता की घोषणा ही मानी जायेगी।”
“ अब तो प्रश्न यहाँ तक जा रहा है कि जनता की गाढी कमाई के बलपर शासन-प्रशासन पर इतना खर्च किसलिये किया जा रहा है। इससे तो अच्छा है कि खुद माओवादी ही आकर शासन चलायें…” एक बङे कवि ने अपनी कल्पना भी रख दी।

बैठक का माहौल बुरी तरह बिगङ गया। माननीय मुखमंत्री के चेहरे पर हवाईयाँ उङने लगी। तभी मुख्य-सचिव के फ़ोन की घंटी बज उठी।
फ़ोन माओवादी नेता पटेल का है-“ चमनलालजी अपने घर सुरक्षित पहुँचा दिये गये हैं। इतनी जल्दी राजनैतिक अस्थिरता फ़ैलाकर मध्यावधि चुनाव करवाना हमारी रणनीति में ठीक नहीं। अपने साथियों को तो हम कभी भी मुक्त करवा लेंगे। हमारे साथी केन्द्रीय सरकार तक पहुँच रखते हैं।”
 सत्रह
टीवी खोलते ही सारे सँवाद मिले-
•    केन्द्र ने धारा 356 का इस्तेमाल करके राजस्थान की भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया। वैकल्पिक व्यवस्था होने तक भाजपा मुख्य-मंत्री ही कार्यभार संभाल रहे हैं।
•    केप्टन भवानीसिंह के नैतृत्व में फ़ौजी टुकङी ने दोहरी सफ़लता प्राप्त की। कमिश्नर माथुर को मुक्त कराने आई टीम अपने साथ हेलीकोप्टरों में आग बुझाने का रसायन लेकर आई थी। जयपुर उतरने से पहले इसकी मदद से आग पर काबू पा लिया गया है। अपह्रत कमिश्नर को छुङाने के लिये कोई प्रयत्न नहीं करना पङा। श्री माथुर स्वयं ही अपने घर लौट आये। मीडीया के सामने आने से उन्होंने मना कर दिया है। राजनैतिक हलकों में चर्चा है कि श्री माथुर के अपहरण और जयपुर की आग के बुझने में कोई समीकरण है। कार्यकारी मुख्यमंत्री ने कमिश्नर को ससपेंड करके कारण बताओ नोटिस दिया है। कमिश्नर माथुर की इस प्रकरण में रहस्यमय चुप्पी ने कई प्रश्न खङे कर दिये हैं।
•    कैप्टन भवानीसिंह के साथ आई संकट-मोचक टीम बिनाविश्राम किये रायपुर रवाना हो गई।
•    छत्तीसगढ में राजनैतिक संकट ने नया मोङ ले लिया। आश्चर्यजनक तेजी से छ्त्तीसगढ प्रान्त के गृह-मंत्री श्रीचमनलाल भी माओवादियों के चंगुल से स्वतः छूट आये। माओवादियों की अपने साथियों को मुक्त करने की माँग पर मंत्रीमण्डल में विचार-विमर्ष चल ही रहा था, कि श्रीचमनलाल के घर होनेका समाचार मिल गया।
•    कैप्टन भवानीसिंह की पूरी टीम बदले हालात में केन्द्र के निर्देशानुसार अपने बैरकों में लौट रही है। इस सारे घटनाक्रम में किसी गहरे रहस्य का सूत्र होना संभावित है।

माओवाद, पुलिस-तन्त्र और राजनैतिक घटनाचक्र पर सभी चैनल गर्मागर्म बहस कर रहे हैं।

कैलाशजी ने टीवी बन्द करवा कर बच्चों से पूछा-“ हम रुपये के कारण होने वाली फ़सावट पर बात कर रहे थे। उसी विषय को क्या कोई छात्र इस घटना-क्रम से जोङ सकता है?”
सभी छात्रों ने एकसाथ हाथ खङे किये।

कैलाशजी ने यशस्विता की ओर देखा। यशस्विता कक्षा के सब छात्रों के वैचारिक रुझान से परिचित है, इसलिये उसे ही तय करना है कि इस विषय पर कौन अपने विचार रक्खे।
“क्या तुम कुछ कहना चाहोगी प्राची?” यशस्विता का इशारा पाकर प्राची खिल गई। प्राची की माँ कल्पना अभी वैदेही के साथ जयपुर अभियान पर गई हुई है। यशस्विता को यह भी जानना है कि कहीं इस तनाव में तो नहीं है कोई छात्र? अपनी प्रिय माता का किसी बङे खतरे के कार्य में संलग्न होना किसी भ्रमित-अवस्था में किसी को भी बैचेन करेगा। गर औसान के दसवीं के छात्र की बात भिन्न है। हर छात्र जानता है कि शरीर साधन है, और सारे साधन या तो जागृति  में सहयोगी या फ़िर समाज-संचालन में। इसके सिवा इनकी कोई भूमिका नहीं। प्राची के उत्तर में यशस्विता की इस शंका का समाधान भी होना है।
“छतीसगढ के गृह-मंत्री का अपहरण से लगाकर वापस घर लौटने तक के घटना-क्रम में धन के बङे पैमाने पर लेन-देन की संभावना लगती है। मेरा अनुमान है कि अपने जेल में बन्द साथियों को छुङाने के लिये विदेशी एजेंसियों से पैसा मँगाया गया, नेता-अफ़सरों के बीच उस धन का पहले से तय फ़ार्मूले पर बटवारा हुआ। गृह-मंत्री की मर्जी के बिना इन परिस्थितियों में उनका अपहरण होना असंभव है, इसलिये धन के लेन-देन में मंत्री महोदय की मुख्य भूमिका होना स्वाभाविक है। इस समीकरण से यह भी साबित किया जा सकता है कि एक बङी राशि फ़िरसे स्विस बैंकों में पहुँची है। एक प्रान्तीय गृह-मंत्री अपने प्रान्त के बजट-प्रक्रिया में भी मुख्य भूमिका निभाता है, सरकारी धन का बङा हिस्सा उनके अधिकार से चालना पाता है, तो एक मन्त्री का देश-विरोधी शक्तियों के साथ साठ-गाँठ होना देश के अर्थ-तन्त्र को अपराधियों के पहुँच में होना साबित करता है। अर्थात अर्थ-तन्त्र का ही अपराधीकरण हुआ साबित हुआ। जो अर्थ-तन्त्र जन-सामान्य के हित में काम करना चाहिये, वही  उनके विरुद्ध एक सशक्त हथियार बन गया है। जैसा कि मयंक बता रहा था, मुद्रा के अधिमूल्यन ने न सिर्फ़ अर्थ-तन्त्र को बिगाङा, बल्कि सभी संस्थाओं और प्रतिभाओं को अपराधी बना दिया है।” प्राची के वक्तव्य से कक्षा पुनः अपने विषय पर लौट आई।
“क्या कोई प्राची के निष्कर्षों से असहमति प्रकट करना चाहेगा?” यशस्विता ने जानना चाहा। किसी भी छात्र ने हाथ नहीं उठाया।
“क्या प्राची के बताये बिन्दुओं के अलावा कोई नई बात इस सन्दर्भ में जोङना चाहेगा?” यशस्विता ने नया प्रश्न किया। इस पर फ़िर सभी छात्रों के हाथ खङे हो गये।
इस पर कैलाशजी ने यशस्विता से कहा, “ कक्षा में सभी इस विषय पर कहने को उत्सुक हैं। प्राची ने संक्षेप में जितने बिन्दुओं पर ध्यान आकर्षित किया है, उसे नमूना मानकर सभी छात्रों की इस विषय में योग्यता का अनुमान किया जा सकता है। और एक बात इन छात्रों ने ही स्पष्ट कर दी कि सभी समस्यायें परस्पर संलग्न हैं, जुङी हैं। अर्थ-तन्त्र की चर्चा में ही माओवाद, अपराध की प्रक्रिया आदि आ गये। बेहतर  होगा कि अब दूसरी समस्या पर चर्चा कर लें। अर्थ-तंत्र पर कुछ-कुछ बिन्दु सभी विषयों के साथ आ जायेंगे।”
“हाँ बाबा! यही ठीक होगा। अन्यथा यदि इसी विषय को पूरा समय दिया गया, तो बाकी सारे विषयों का समावेश इसी में हो जायेगा।” यशस्विता ने बाबा से सहमति जताते हुये अगला विषय लेने वाले छात्र का नाम जानना चाहा।
“हर्ष कुमार की बिटिया हर्षा अब अलगाववाद को दीपित करेगी।” कैलाशजी के इस विनोद ने हर्षा के साथ-साथ पूरी कक्षाको हर्षित कर दिया। छात्रों के लिये यह बङी बात है कि उनके गाँव के सम्मानित व्यक्ति के साथ उनका पारिवारिक रिश्ता-सम्बन्ध है। कैलाशजी अधिकांश छात्रों के माता-पिता को जानते हैं। माता-पिता का स्मरण किसी भी बच्चे के मनमें प्रसन्नता भरता है। सब छात्र जानते हैं कि हर्षा की माँ दीप्ती एक अच्छी कवि हैं, और अपनी माँ का यह गुण हर्षा ने भी पाया है। कक्षा ने अनेक बार हर्षा की कविताओं और गीतों का आनन्द लिया है। कैलाशजी के सम्बोधन ने इस निजी बात को भी स्पन्दित किया। हर्षा अतिरिक्त रूप से प्रसन्न हुई। प्रसन्नता में अध्ययन पैना हो जाता है।



अट्ठारह
आज हर्षा को अलगाववाद पर बोलना है। हर छात्र को विषय तत्काल दिया गया, मगर हर्षा को लगा कि उसे सबसे सरल विषय दिया गया है, इस विषय पर तो वह काव्यात्मक प्रस्तुति भी दे सकती है। अपने स्थान पर खङे होते हुये हर्षा ने दोहा छन्द को साध लिया। अपने विषय के प्रस्तुतीकरण को भी साध लिया।

ईश्वर संग मैं एक हूँ, केवल भ्रम अलगाव।
इस भ्रम का विस्तार ही, बना वाद अलगाव। 1

मानव-जाति एक है, जाति-धर्म भ्रम-भेद।
उलझी सारी व्यवस्था, बढा खेद पर खेद।2

भाषाओं की विविधता, मानव-कौशल मान।
‘वाद’ बना मतभेद की, सीमा-रेखा जान। 3

जलवायु के भेद से, वर्ण-भेद सच बात।
दैहिक-स्तर के भेद से, क्यों बिगङे जजबात? 4

भ्रमित व्यवस्था की उपज, निर्धन और धनवान।
द्वैष, क्लेष और दुःख का, उपजाया सामान। 5

शिक्षा बन गई भेद का, क्यों सशक्त आधार।
मुक्त करे भ्रम-भेद से, हो विद्या-संचार। 6

सारे जन सुख चाहते, सार्वभौम सिद्धान्त।
राष्ट्रान्तर है कल्पना, धरा राष्ट्र अभ्रान्त। 7
 
ऊँच-नीच छोटा-बङा, दैहिक स्तर के भेद।
झगङों का आधार भ्रम, जीवन-स्तर पर एक। 8।

स्त्री-पुरुष प्रयोजन से, सिर्फ़ देह तक भेद।
पूरकता-उपयोगिता, दूर करे हर खेद। 9

तीन अवस्था भेदमय, पदार्थ-प्राण और जीव।
सृष्टि-क्रम को जान लो, मानव बनो हे जीव। 10

सही प्रयोजन सृष्टिका, ‘एक’ को जाने लोग।
एक बनें तो सहज दूर, अलगाववादी रोग। 11

देश-प्रान्त या ताल्लुका, व्यवस्था-गत ही जान।
वाद बना तो दुःख है, पहले जान के मान। 12।

अलगाववादी भेद भ्रम, मूल तत्व अद्वैत।
सह-अस्तित्व को जानकर, मिटता भ्रम का द्वैत। 13

सही में सारे एक हैं, भ्रम में रहें अनेक।
अनेकता ही दुःख है, एक बनो तो नेक। 14

अनेकता अलगाव को, पोषण देती खूब।
जीवचेतना में अलग, मानवता है नेक। 15।

जङ-चेतन इकाईयाँ, सम्बन्धित पहचान।
अलग कहाँ है स्वयं से, पहले खुद को जान। 16

पूरकता-उपयोगिता, सम्बन्धों की डोर।
विकास-जागृति-क्रम चले, पूर्णता की ओर। 17।

पूर्ण बने मानव सभी, धरा स्वर्ग है देख।
अलग रहे सच से अगर, स्वयं नर्क भी देख। 18।

वाद विवाद का जनक है, समाधान सँवाद।
सँवादों से सुख मिले, भागे भय-भ्रम-वाद। 19।

हैं अनन्त अलगाव पर, सही बात है एक।
सही जानकर सुख मिले, बनता मानव नेक। 20

कक्षा की तालियों के बीच हर्षा ने अलगाववाद पर अपना काव्य-पाठ सम्पन्न किया। सभी के चेहरों की मुस्कुराहट बता रही थी कि सब इस प्रस्तुति से पूरा सहमत थे फ़िरभी यशस्विता ने पूछ लिया, “क्या अलगाववाद पर हुई इस प्रस्तुति पर कोई ट्टिपणी या समीक्षा करना चाहेगा?”
किसी ने हाथ खङा नहीं किया। सुरेन्द्र मुस्कुराकर खङा हुआ। कहने लगा, “सचमुच कमाल हो गया। हर्षा ने अलगाववाद की भीषण समस्या को समाधान की दिशा से पकङा है। इससे अलगाववाद के सारे आयाम तो गिना ही दिये, पर हर बार समाधान नजर आया। विषय को समाधान के धरातल पर आकर देखा जाये तो सिर्फ़ समाधान ही दिखता है, समस्या दिखती ही नहीं देती। दूसरी बात यह ध्यान में आई कि काव्य में हर्षा ने आज दोहा छन्द को पकङा। दो पंक्तियों में हर बार पूरी बात समा गई। यही बात अगर सामान्य गद्य में कही जाती; जैसा कि किसी भी विषय के प्रस्तुतीकरण की सर्व-सामान्य विधा है; तो न सिर्फ़ बात लम्बी होती बल्कि अधूरी भी रहती। काव्य में कहने से कथ्य की कलात्मकता भी बढती है, प्रभावोत्पादकता भी। हर्षा के इस प्रस्तुतीकरण के बाद अब अपना विषय रखने वाले छात्रों के सामने नया मानदण्ड बन गया है। मैं हर्षा को बधाई देना चाहता हूँ।”
सुरेन्द्र की बधाई का समर्थन सभी ने ताली बजाकर किया, तो यशस्विता ने उसी सूत्र को पकङकर बात आगे बढाई, “बधाई के हकदार अब आने वाले सभी छात्र हैं। बधाई- अर्थात आगे बढने के लिये शुभ-कामना।  तो यह शुभ-कामना सारे छात्र स्वीकारें, प्रस्तुतीकरण को बेहतर बनायें। मेरा बाबा से निवेदन है कि अगला प्रस्तुतीकरण सुरेन्द्र से ही कराया जाये, बधाई उसने दी, उसीको मिलनी चाहिये बधाई की जिम्मेदारी।”

पूरी कक्षा के साथ कैलाशजी भी मुस्कुरा दिये।
कैलाशजी सुरेन्द्र को उसका विषय बतावें, इससे पूर्व हम जयपुर प्रकरण पर चलते हैं।


उन्नीस
श्रेया ने सबके लिये टेबल पर नाश्ता लगाया।
टेबल पर मेनका और माथुर साहब भी शामिल हैं। कल आग शान्त होने के बाद माथुर साहब ने अपना इस्तीफ़ा भेज दिया, मगर मीडीया के सामने आने से मना कर दिया।
“पहले सारा माजरा समझ तो लूँ कि यह हुआ कैसे? कैसे इतनी जल्दी योजना बन गई, सैंकङों गावों से सम्पर्क साध लिया गया, तेल-चोरी के लिये सबको एकसाथ राजी करना कोई हँसी-खेल वाली बात तो नहीं लगती। छोटे-छोटे किशोर और घरेलू महिलाओं ने इतना बङा काम कर दिया जिसके लिये राज्य की पूरी मशीनरी चिन्तित थी। यदि यह टीम ना आई होती, यदि इसने मेरा अपहरण ना किया होता तो तेलके कुंये अब तक जल रहे होते। इतनी भयंकर लम्बी आग के दुष्परिणाम सोचकर ही मन घबरा जाता है। आखिर कौन है इसके पीछे? जयपुर में ऐसा कौन है जो इतनी त्वरित योजना बना सकता है, और इसे क्रियान्वित कर सकता है? कौन? कौन? कौन?”
यह सब सोचकर ही माथुर साहब का दिमाग फ़टा पङता है। माथुर साहब ने पहले वैदेही को देखा, उसके बुद्धि-कौशल का लोहा मानकर उसके आगे अपने आपको समर्पित किया। फ़िर टीवी पर जगह-जगह तेल चोरी होते हुये देखा, तो उसके पीछे किसी बङे षङ्यन्त्र का अनुमान लगाया। आग बुझने के बाद श्रेया, विक्रम और अजय को देखा। इन सबसे पता चला कि किसी औसान गाँव से विक्रम,अजय, वैदेही और कल्पना के साथ कोई बीसेक जन आये। यहाँ से श्रेया की बीसेक सहेलियाँ भी लगी। इनमें से एक भी आग लगने वाली जगह पर नहीं गया। दूर-दूर गाँवों में जाकर चमत्कार किया और आग बुझा दी। इस सबके पीछे अवश्य कोई असाधारण मेधा-क्षमता सम्पन्न व्यक्ति होगा। बिना किसी बाहरी या सरकारी सहायता के जो आदमी इतना बङा कार्य कर सकता है, वह अवश्य किन्हीं अलौकिक शक्तियों वाला होगा। फ़िर यह कार्य तो सरकारी नियमों को तोङकर कराया गया है। देखा जाये तो एकसाथ प्रान्तीय और केन्द्रीय सरकारों को चुनौती देकर चला है पूरा अभियान।
माथुर साहब सारे घटनाक्रम को सोच-सोच कर परेशान हैं।
“चाय और पोहे दोनों ठंडे हो रहे हैं माथुर साहब! लीजिये…” श्रेया ने मेनका की प्लेट में और पोहे परोसते हुये कहा।
“ओ हाँ… लेता हूँ…” कहते हुये माथुर साहब स्वस्थ हुये……………… “एक बात बताईये? यह सब करने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?” – माथुर साहब ने सामने बैठी वैदेही से पूछा।
“क्या माथुर साहब! अरे भई मेरी बेटी जयपुर में है, मेरी कालिज की सहेली मेनका है… उसके जीजाजी हैं …  क्या मुझे आप सबकी फ़िक्र नहीं करनी चाहिये? या और भी किसी प्रेरणा की जरुरत बाकी रह जाती है?” वैदेही अभी भी माथुर साहब को टालू जवाब ही देती है।
वैदेही के उत्तर से मेनका मुस्कुराई।
मेनका की मुस्कुराहट देखकर माथुर साहब खिसिया गये, मगर अन्य कोई रास्ता भी तो नहीं है। माथुर साहब की जिज्ञासा जब तक संतुष्ट नहीं हो जाती, वे वैदेही को कैसे छोङ सकते हैं! माथुर साहब अभी तक यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि सरकारी आदमी के बारे में आम आदमी यही मानता है कि वे अव्वल दर्जे के मूर्ख और जाहिल-कामचोर होते हैं। उनका बुद्धि-कौशल ठस्स हुआ रहता है। अपनी कल्पना और अपने अनुमान लगाने का अभ्यास मर चुका होता है।

“आपके इतने प्रयत्न के बावजूद  यदि आग बुझने से पहले प्रशासनिक मशीनरी आपको पकङ लेती…   …”
माथुर साहब की इस बात को बीच में काटकर मेनका बोली- “ क्या जीजाजी! यह कैसे संभव है? यह कैसे संभव है कि वैदेही कोई निर्णय करे, और वह पूरा ना हो? ऐसा भी कभी होता है क्या?”
“क्यों? आपकी सहेली कोई भगवान है? या उनको कोई विशेष सिद्धियाँ मिली हुई हैं? मेनका! आपके इस विश्वास का आधार क्या है? यही जानने के लिये तो मैं अपने घर ना जाकर सीधा आपके पास आया हूँ।”
-माथुर साहब ने अपनी वेदना साफ़-साफ़ कह दी।

“अरे, … मैं तो कुछ और ही समझे बैठी हूँ। …” वैदेही ने फ़िर फ़िरकी लेने की कोशिश की। मेनका समझ गई कि वैदेही बात को घुमाने की कोशिश कर रही है। अब उसने अपने जीजा का पक्ष लेना उचित समझा। “अब बहुत हुआ वैदेही। अब बताओ कि यह सब तुम लोग कैसे कर पाते हो? अब डरने की भी जरुरत नहीं, क्योंकि जीजाजी तो इस्तीफ़ा भेज चुके। बताओ पूरी बात।”
वैदेही सहजता पूर्वक बोली- “बात तो सीधी-सरल है माथुर साहब! धरती के सारे मानवों के लिये बन्धुत्व भाव और अपनापन मन में स्वीकृत हो जाये, तो उसके किसी भी संकट में अपनी भूमिका मानव स्वयं तय कर लेता है। हमारा गाँव भी कोई ज्यादा दूर तो है नहीं। आ गये। बाकी परिस्थिति का आकलन करके समस्या से निपटने का रास्ता तो बच्चे भी बना लेते हैं। यह रास्ता हमारे बच्चों ने ही बताया। श्रेया का बङा भाई अभिषेक पहले जयपुर आ चुका है। अपने एक माह के जयपुर प्रवास में उसने आस-पास के गाँव भी देखे। गाँवों में बने सम्पर्कों से और इन्टरनेट की मदद से पता चल गया कि कई जगह से तेल चोरी होती है। चलती आगमें तेल चोरी कराने में खतरा तो बहुत बङा था, किन्तु उससे कई गुना बङे खतरे में हम पहले से थे। यह बात अनपढ को भी समझ में आ जाती है। गाँववालों ने सहायता की तो इस प्रक्रिया में वे अपना हित देख पाये। गिरफ़्तारी का भय भी रहा होता, तब भी वे आग बुझाने का प्रयत्न अवश्य करते। यही बात सैना के भवानीसिंहजी को भी स्वीकार हो गई, और उन्होंने सैना के भण्डार से ही आग बुझाने का रसायन अपने हैलीकोप्टरों में रख लिया। यही आपने भी किया, क्योंकि संकट आपने स्वयं अपने पर माना। संकट से बाहर निकलना सबसे पहला काम होता है, यह सर्व-सामान्य को स्वीकार होता है…” वैदेही ने कहा।

“यह सारी योजना अभिषेक की…… कहाँ है अभिषेक?” माथुर साहब ने फ़िर टटोलना चाहा।
“वह औसान ही है। नेट और मोबाईल के जरिये पूरे अभियान को चालना दी…।” वैदेही ने सहज मान से बताया।
“इतना बङा अभियान दूर बैठकर चलाया? कमाल का विश्वास है। क्या मैं अभिषेक से मिल सकता हूँ?” माथुर साहब एक बच्चे की तरह ललक कर बोले।
“क्यों नहीं। चलिये औसान। … लेकिन अभिषेक इस काम का सारा श्रेय अपनी टीम को- हम लोगों को देता है। वह नहीं चाहता कि मीडीया पर उसकी तारीफ़  हो। उसके लिये यह एक सामान्य कर्तव्य मात्र है। आप मिलें तो इस बात का ध्यान रखें। अपने बाबा का लाडला पोता है वो।” वैदेही अभिषेक की तारीफ़ करते/सुनते हुये मानिनी हो गई।
“करता क्या है अभिषेक?”
“तृतीय वर्ष विज्ञान का छात्र है…”
“कालेज स्टूडेन्ट्…!” माथुर साहब ऐसे चौंके मानो बिछू ने काट लिया हो।
वैदेही चुप रही। श्रेया बोली,
“बाबा के निर्देशन में है भैया। जो करे सो थोङा।”
माथुर साहब ने फ़िर झटका खाया, “बाबा? बाबागिरी? चमत्कार? ???

बीस

“सुरेन्द्र पानी की समस्या पर बोले।” – कैलाशजी ने कहा।
दसवींकक्षा में आज सामाजिक सरोकार के अलग-अलग विषयों पर चर्चा चल रही है। तीन विषय हो गये। गाँव के बुजुर्ग श्री कैलाशजी की निगरानी में छात्रों का बौद्धिक स्तर जाँचा जा रहा है। कैलाशजी किसी भी छात्र को कोई नया विषय बताते हैं, और तत्काल वह छात्र उस विषय पर अपने विचार रखता है। सामान्य पाठ्यक्रम से आगे जाकर वर्तमान की गंभीरतम समस्याओं का खुलासा करते हैं छात्र। विषय प्रवर्तन के बाद कक्षा के शेष छात्र प्रश्नोत्तर करते हैं, अथवा अपनी सहमतियाँ/असहमतियाँ परस्पर बाँटते हैं। कक्षाध्यापिका यशस्विता का प्रयत्न रहता है कि एक भी छात्र पीछे ना रह पाये। इस विद्यालय में वार्षिक परीक्षायें नहीं होती। कोई किसीसे आगे-पीछे नहीं रहता, सारे छात्र प्रत्येक विषय को पूरा ग्रहण करते हैं। माध्यमिक परीक्षाओं में औसान के सभी छात्र शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करें, यह आशा सभी को रहती है।
सुरेन्द्र ने खङे होकर कहना प्रारम्भ किया- “ जीवन संचालन में पानी का अहम प्रयोजन है। पदार्थावस्था पूर्ण होनेके बाद सृष्टिके विकास-क्रम में पहला रसायन पानी बना। प्राणावस्था की रचना और विकास में पानी एक आवश्यक तत्व है। प्राणावस्था की इकाईयाँ बढने के साथ-साथ पानी की आवश्यकता ज्यादा हुई, उसी अनुरुप पानी की मात्रा भी बढती गई।  क्रमशः जीवावस्था बनी, मानव का प्रादुर्भाव हुआ, उन सबकी आवश्यकता के अनुरुप पानी की मात्रा धरती पर बढती ही गई। वर्तमान में पदार्थ और पानी एक और तीन के अनुपात में है। पानी की भूमिका न सिर्फ़ प्राणावस्था, जीवावस्था और मानव के लिये है, बल्कि समग्रता में धरती के लिये भी पानी महत्वपूर्ण है। पानी द्रव है, किन्तु शेष द्रवों की तुलना में कई अर्थों में विलक्षण है। ताप के प्रभाव से जैसे सभी द्रव नीचे से गरंम या ठंडा ठंडे हुआ करते हैं, किन्तु पानी ऊपर की तरफ़ से गरम या ठंडा होता है। पानी की इस विलक्षणता पर न सिर्फ़ समुद्री जीवों के प्राण सुरक्षित हैं, बल्कि धरती पर भी जीवन की सुचारु चालना संभव हुई।
समुद्री जीव खारे पानी में सहज हैं, जबकि धरती की समस्त जीव-राशि को मीठे पानी की आवश्यकता है। खारे पानी और मीठे पानी का अनुपात प्रकृति ने निन्यानवें और एक रक्खा है। निन्यानवे भाग खारा पानी है तो सिर्फ़ एक ही भाग मीठा पानी धरती पर उपलब्ध होता है। इसी एक भाग में धरती के अन्दर का जल भी शामिल है। भूगर्भ का जल धरती के अपने स्वास्थ्य के लिये है, न कि मानव के लिये।
मीठे पानी उपलब्धि या तो बरषात से होती है, अथवा हिम-ग्लेशियरों के पिघलने से। मानव के पास अन्य कोई तरीका मीठा जल प्राप्त करने का नहीं है। प्राकृतिक- चक्र से प्राप्त जल को कुओं, बावडियों, तालाबों आदि में संग्रहित रखने की परम्परा मानव-निर्मित है। विज्ञान के विकास के साथ मानव सुविधा भोगी बनातो पानी का संग्रह कुओं तालाबों की बजाय आकाश-चुम्बी टंकियों में होने लगा है। पानी का धरती के साथ एक नैसर्गिक प्रयोजन सहित सम्बन्ध है, उसे ना पहचान कर सिर्फ़ नलों में सुविधाजनक उपलब्धि के लिये जल-संग्रह-टंकियाँ बनाना अनेक दिशाओं से हानिकारक है। इन्हीं टकियों के कारण भूगर्भ स्थित जल का विवेकहीन दोहन धरती के अस्तित्व पर संकट बनकर खङा हो गया है। पानी के स्वाभाविक बहाव के विरुद्ध बने बाँधों ने मानव को नये संकटों में डाला है। भ्रमित मानव ने प्रकृति को अपना प्रतिद्वन्द्वी मानकर पानी-मिट्टी के साथ जितने प्रयोग किये, उनका दुष्परिणाम है कि आज मानव के उपयोग के लिये पानी की कमी सार्वभौम स्तर पर दिखाई देती है। पानी पर काम करने वाले अनेक विशेषज्ञ एकमत होकर कहते हैं कि अगला विश्व-युद्ध पानी के लिये लङा जायेगा। भ्रमित-व्यवस्था में फ़ंसा मानव वर्तमान में घर, मुहल्ला, गाँव, शहर, प्रान्त, देश और अन्तर्राष्ट्रीय—सभी स्तरों पर पानी के लिये एक दूसरे पर दोषारोपण करता है, झगङता है।
इसकी प्रतिक्रिया में जल-संरक्षण और भूगर्भ स्थित जल का स्तर ऊँचा करने का अभियान वैश्विक स्तर पर चल रहा है। इन प्रयासों के आधार में खण्डित और भ्रमित दृष्टिकोण प्रभावी होने के कारण नई-नई समस्यायें बनती हैं।
इस दुष्चक्र से बाहर आने का मार्ग मानव के पास पहले से है, भ्रम के कारण देख नहीं पा रहा। जैसे कि बाँसुरी की मधुर धुन सुनकर गाय दूध ज्यादा देती है, फ़ूल अधिक खिलते हैं, अर्थात पौधों-पेङों में पानी की मात्रा बढ जाती है, माँ के स्तन में बच्चे के लिये ज्यादा दूध बनता है और धरती के गर्भ में जल का स्तर बढ जाता है। इसी प्रकार मानवता के सभी मूल्य धरती का जलस्तर बढाने में निमित्त बनते हैं। मानव मूल्यों का साक्षात्कार करने वालों की सँख्या बढे तो इस प्रभाव से ही धरती के गर्भ का जलस्तर सही मात्रा में ऊपर आ जायेगा। नियमतः सृष्टि की सारी रचना और विकास मानव के लिये सुख-सुविधा की दिशा में सक्रिय है। सृष्टि के नियमों को मानव आसानी से जान सकता है, रहस्य जैसा कुछ भी नहीं है। समाधान है, समस्या नहीं।”
सुरेन्द्र ने अपना वक्तव्य संक्षेप में रखा। सुरेन्द्र की तरह ही सभी छात्र यह समझ रहे थे कि समय की कमी है। सभी तैंतीस छात्रों का एक अलग विषय पर बोलना है, और विषय को पूरा खोलना भी है। कम समय में विषय पर यदि कुछ छूट भी जाता है, तो उसे साथी छात्र सँवाद पूर्वक पूरा कर देंगे। एक ही छात्र अपने विषय को समग्रता में रखने की कोशिश करेगा, तो दो दिन अकेला ही बोलता रह सकता है। पहली कक्षा से ही सारे छात्र यह संस्कार पाये हैं कि जीवन से जुङे हर विषय पर सबको सही समझ बनानी है। परस्पर प्रतियोगिता का भाव कोई शिक्षक बनने ही नहीं देता। प्रतियोगिता प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है, इसलिये भ्रम-पूर्वक दुःख देने वाला है। प्रतियोगिता के स्थानपर परस्पर सहयोग का आचरण अभिभावकों –शिक्षकों ने बनाने का प्रयत्न किया। वास्तव में ऐसा प्रयत्न बच्चों के लिये नहीं हुआ, बल्कि सारे जन स्वयं अपनी जागृति में होश-पूर्वक आचरण करते। उनको देखकर बच्चे वैसा कार्य-व्यवहार सीखते गये। तीन वर्ष की अवस्था से ही अपने बङे भाई-बहनों के साथ गोशाला अथवा सब्जी आदि की बगिया में खेलते हुये, काम करते हुये जीवन से जुङे आयामों पर उनकी दृष्टि सकारात्मक बनती गई। दसवीं कक्षा तक किसी को परीक्षा नहीं देनी पङी। अभिभावक/शिक्षक बच्चों की रुचि और क्षमतानुसार उनकी योग्यता का मूल्याँकन करके उसे आगे की कक्षा के पाठ देना शुरु कर देते। इस प्रक्रिया में कोई बच्चा  पाठ्यक्रम को एक वर्ष से पूर्व ही पूरा कर लेता, और सहज ही अपने साथियों की सहायता करने लगता। अपना सीखा हुआ अपने परिजन-मित्रों को बताने का उत्साह शैशवावस्था में नैसर्गिक रूपसे रहता ही है। यही उत्साह परस्पर सहयोग पूर्वक सीखने-सिखाने में ढल जाता है। किसी को भी यह कार्य अलग से बताने या सिखाने आवश्यकता नहीं होती। अभिभावक अपने स्वयं के जागृति-क्रम की पाक्षिक समीक्षा-बैठक में अपने स्वयं के कार्य-व्यवहार की समीक्षा करते, उसमें बच्चों के लिये सहज ही भूमिका बन जाती। इस प्रकार जागृति-क्रम में परस्पर सहयोगी बनते अभिभावक औसान के सारे बच्चों के लिये प्रेरणा-स्रोत हैं।
“सुरेन्द्र के प्रस्तुतीकरण में कोई सहयोग करना चाहेगा?”- यशस्विता ने छात्रों की सह-भागिता का आह्वान किया।
किसी छात्र ने हाथ नहीं उठाया।
इक्कीस
माथुर साहब की जिज्ञासा उनको सीधा औसान गाँव ले आई। कुछ दिन के लिये श्रेया भी अपने मायके का आनन्द लेने आ गई। मेनका को वैदेही के पूरे व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण और जीजाजी का आग्रह ले आया। चारों वैदेही के हैलीकोप्टर में बैठकर आ गये।
गाँव का माहौल, ग्राम-स्वालम्बन के सारे प्रकल्प, अभिभावक विद्यालय, सामूहिक पुस्तकालय, हर परिवार के चार साल से बङे प्रत्येक सदस्य की उत्पादन में भागीदारी, उत्पादन इकाईयों का घर-परिवार के साथ संलग्नता, ऊर्जा के वैकल्पिक साधन, स्वास्थ्य की परिवार-मुखी व्यवस्था, हर स्तर पर सुरक्षा का अचूक तन्त्र और सभी ग्रामवासियों की एकता देखकर माथुर साहब हैरान रह गये। बाबा से भेंट करने से पहले इस जागृत तन्त्र के बारे में विस्तार से जानने का प्रयत्न किया माथुर साहब ने।
“बिना पुलिस थाने के गाँव की सुरक्षा कैसे करते हैं आप?” बाबा ने सुरक्षा-प्रमुख से पूछा।
“आपका प्रश्न त्रुटिपूर्ण है माथुर साहब! पहले इसे ठीक करना होगा…” सुरक्षा प्रमुख ने मुस्कुराते हुये कहा।
“क्या मतलब?” माथुरसाहब इस ट्टिपणी और मुस्कुराहट की पहेली ना सुलझा सके।
“पुलिस सुरक्षा करती नहीं, बल्कि पुलिस के कारण आम आदमी की सुरक्षा का एक नया आयाम जुङ जाता है। हमारे गाँव में न तो पुलिस है, ना कभी होगी।” सुरक्षा प्रमुख ने संजीदगी से कहा।
अब मुस्कुराने की बारी माथुर साहब की है। “आप तो ऐसे कह रहे हैं… पुलिस कभी नहीं होगी… अगर सरकार चाहे तो कल पुलिस चौकी खुल जाये…खैर, आपकी सुरक्षा-व्यवस्था कैसी है?” माथुर साहब ने जिज्ञासा की।
“पारिवारिक सुरक्षा व्यवस्था है औसान में। परिवार में जैसे एक-दूसरे से भय नहीं होता, सब एक-दूसरे की सुरक्षामें सहज तैयार रहते हैं, यही भाव पूरे ग्रामवासियों में है। सब एक-दूसरे से भली प्रकार परिचित हैं, बल्कि सबमें परस्पर बन्धुभाव है…” सुरक्षा प्रमुख ने कहा।
“लेकिन किसी भी घरमें  ‘सुरक्षा-प्रमुख’ की नियुक्ति की बात तो नहीं सुनी…अगर गाँव में पारिवारिक सुरक्षा व्यवस्था है तो आप ‘सुरक्षा-प्रमुख’ कैसे बन बैठे?” माथुर साहब की कमिश्नरी आदत फ़िरसे जाग गई।
“परिवार बङा हो जाये, सदस्य एक हजार से ज्यादा हो जाये तो शिक्षा-प्रमुख, स्वास्थ्य-प्रमुख, आपूर्ति प्रमुख, सफ़ाई-प्रमुख आदि की तरह सुरक्षा प्रमुख भी आवश्यक हो जाता है। और बङा परिवार हो जाये तो ये व्यवस्थायें ही प्रान्तीय-स्तर पर बनती हैं, पूरे देश के स्तर पर बनती हैं। इसमें नया क्या है?” सुरक्षाप्रमुख ने बताया।
“प्रान्त और देश में सुरक्षा-प्रमुख और सुरक्षा-तन्त्र सरकार की योजना और मर्जी से बनाया जाता है, मगर आपकी बातों से तो सरकारी तन्त्र के लिये अश्रद्धा और विरोध झलकता है? दूसरी बात, आपको वेतन कौन देता है? गाँव की व्यवस्थाओं के लिये धन कहाँ से आता है? …”माथुर साहब की जिज्ञासा अब उत्सुकता का रूप लेने लगी।
“वैसे तो अर्थ-व्यवस्था का प्रश्न गाँव के व्यवस्था प्रमुख के लिये है। किन्तु आपने सरकारी व्यवस्था और परिवार-केन्द्रित व्यवस्था का फ़र्क जानना चाहा है। इस प्रश्न का उत्तर तो आठवीं-नवीं कक्षा का छात्र भी दे सकता है। सरकार का सारा तन्त्र भय और प्रलोभन के आधार पर चलता है। भय-प्रलोभन की व्यवस्था में न अपनापन होता है, न जिम्मेदारी का भाव। इन दोनों के अभाव में कोई भी व्यवस्था प्रभावी नहीं हो सकती। अक्सर सफ़ाई कर्मी ही गन्दगी करते हैं, और सुरक्षा-कर्मी डाकू बन जाते हैं। देख लीजिये, सरकारी शिक्षा के कारण मानव का जितना नुक्सान होता है, उतना नुक्सान तो अनपढ बने रहने से भी नहीं हो सकता। सरकार विकास की पंचवर्षिय योजनाओं में जितना बजट खर्च करती है; प्रति व्यक्ति एक वर्ष में जितना खर्च होता है, उतनें में देश का एक-एक आदमी जीवन
भर ऐश्वर्य पूर्वक जीने का सामान स्वयं उत्पादित करने का सुख पा सकता है। हमारे औसान गाँव में आज ग्यारह परिवारों के बूढे-बच्चे मिलाकर उन्नीस सौ तिहत्तर जन हैं। और इस जिले की आठ तहसीलों के कुल छः सौ तिरेप्पन गाँव हैं। जिला प्रशासन को विकास और वेतन के नाम पर प्रतिवर्ष दो-ढाई हजार करोङ रुपये मिलते हैं। इस हिसाब से औसान गाँव के हिस्सेमें कम से कम तीन करोङ रुपये प्रति वर्ष आयेंगे। आप देख लीजिये, गाँव में गत दस वर्षों से एक भी सरकारी पैसा खर्च नहीं हुआ। और हमारे गाँव में सार्वजनिक उपयोग के उपक्रम सबसे ज्यादा हैं…” सुरक्षा –प्रमुख की बातें माथुर साहब को कत्तई अविश्वसनीय लग रही हैं। लेकिन गत दो दिनों में उन्होंने देखा है। गाँव की सङकें ऐसी हैं कि अमेरिका भी मात खा जाये। पुस्ताकालय में ही आठ कम्प्यूटर सेट इन्टर्नेट सुविधा के साथ लगे हैं। एक भी विद्यालय भवन नहीं, मगर एक भी बच्चा बिना पढे नहीं दिखता। गाँव का बना कपङा इतना महीन और मुलायम है कि खुद पहनने का मन करता है।  बर्तन, खेती और बागवानी के औजार,खिलौने, लकङी का कलात्मक फ़र्नीचर,… और तो और यहाँ कम्प्यूटर बनाने और सारे ही प्रकार के कम्प्यूटरों की मरम्मत करने वाले लोग हैं, किन्तु न तो कोई व्यवसाय है, न कोई नौकरी की बात करता है। प्रचलित अर्थों में कोई एक भी उद्योगधंधा गाँव में नहीं है, तो इस गाँव का राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था में योगदान शून्य है। दूसरी तरफ़ इस गाँव पर राष्ट्रीय धन की लागत भी शून्य है। न तो कोई सरकारी संस्थान यहाँ स्थापित हुआ है, न कोई सरकारी शिक्षा-केन्द्र्। न अस्पताल न थाना। न पोस्ट ओफ़िस न PWD का कोई इंजीनियर। इससे भी बङा आश्चर्य यह है कि इन सबके लिये कोई माँग भी नहीं है, बल्कि कह रहे हैं कि जरुरत ही नहीं है, आने नहीं देंगे!
“लेकिन यह क्या बात हुई कि किसी सरकारी संस्था को आप आने ही नहीं देंगे! देशकी संवैधानिक संस्थाओं के प्रति इतना अवमानना का भाव? क्या यह गाँव विद्रोही या आतंकवादी है? क्या जिला-कलेक्टर दौरे पर नहीं आता? बात क्या है?” माथुर साहब की उत्सुकता अब व्यग्रता में बदल गई।
“विद्रोही छोङिये, यहाँ आपको कोई विरोधी मानसिकता का व्यक्तिभी नहीं मिलेगा। पर आपकी बाकी जिज्ञासाओं का समाधान बाबा करें, तभी ठीक रहेगा।” सुरक्षा प्रमुख का नम्र उत्तर सुनकर माथुर साहब बाबा से भेंट के लिये व्यग्र हो उठे।
बाईस
 
“अमृत परमाणु विस्फ़ोट पर अपने विचार रखे। यह भी बताये कि सामाजिक सरोकार के मुद्दों में परमाणु बम विषय को शामिल करना कैसे युक्ति-संगत है?”
-श्री कैलाशजी ने कक्षा दस में चल रहे चर्चा सत्र को आगे बढाने का संकेत किया।
अमृत ने अपने स्थान पर खङे होकर बाबा को प्रणाम किया। चौथी पीढी के सारे ही बुजुर्गों को सम्मानपूर्वक बाबा कहकर ही बुलाते हैं बच्चे। फ़िर अमृत के पिता उमेश वर्तमान में गाँव के कम्प्यूटर-प्रमुख हैं। और माता सरला ग्राम-संचालन समिति की सदस्या। अमृत के माता-पिता से मिलने कैलाशजी अक्सर आते हैं, तो अमृत से अवश्य अलगसे बात करते हैं। किशोरावस्था का वृद्धावस्था के साथ सार्थक सम्पर्क दोनों के जागृति में उपयोगी-पूरक है। किशोरावस्था मानसिक/भावनात्मक आवेगों के अतिरेक की उम्र है। शरीर में बनती अतिरिक्त ऊर्जा को सार्थक दिशा में उपयोग कर लिया जाये, तो न सिर्फ़ सामाजिक चालना बाधामुक्त होती है, बल्कि सामूहिक कार्यों के लिये अकल्पनीय साधन सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं। औसान की ग्राम-संचालन समिति में अधिकतर तीसरी पीढी के लोग होते हैं, किन्तु प्रत्यक्ष कार्य का सम्पादन आगे की पीढी के किशोर-युवा ही करते हैं। इस तरह समाज को भावी नैतृत्व की आश्वस्ति मिलती है, छात्रों का शारीरिक/मानसिक/बौद्धिक/भावनात्मक विकास होता है। अमृत के प्रणाम में कृतज्ञता और कैलाशजी की मुस्कान में स्नेहभरा आशीर्वाद सभी ने महसूस किया।

“पदार्थावस्था की (अध्ययन के लिये उपयुक्त) सबसे छोटी इकाई परमाणु है। इसके केन्द्र में न्यूट्रोन, पोट्रोन और परिधि में इलेक्ट्रोन अंशरुपमें गतिशील रहते हैं। परमाणु की परिधि में जितने अंश होते हैं, केन्द्र में कम से कम उतने या उससे ज्यादा अंश होते हैं। परिधि के अंशों में कम या ज्यादा होने की प्रस्तुति रहती है।”…   … खबर आई कि बाबा परमदास का शरीर शान्त हो गया।
तेईस
बाबा का अन्तिम संस्कार करके सब घर लौटे। संस्कार-स्थल पर लगभग पूरा गाँव उपस्थित रहा। सब बाबा की ही बात कर रहे थे। वहीं माथुर साहब को पता चला कि औसान गाँव बाबा का ही बनाया और बसाया हुआ है। बाबा के प्रति सभी की समान पूज्य भावना है। दूसरे दिन से लगातार 12 दिन तक बाबा के घर में  श्रद्धाँजलि सभा चलनी है। अत्यावश्यक कार्यों को छोङकर दैनिक रुपसे होने वाले सभी कार्य स्वतः प्रेरणा से स्थगित हैं। बिना किसी औपचारिकता के गाँव के लोग और आसपास गाँवों से बाबा के परिचित जन आते रहे। बाबा के साथ जुङी स्मृतियों को स्मरण करके सब अपनी-अपनी जागृति-क्रम को पुष्ट करते हैं। माथुर साहब ने बाबा के बारे में सबसे पूछ-पूछ कर भी काफ़ी बातें जानी।
मुम्बई में परमदासजी का बङा व्यापार था। दादीसेठ अग्यारी लेन में बैठा करते थे। ग्यारह सन्तानें हुई। भरा-पूरा परिवार है। घर में बहुत धार्मिक संस्कार रहे, किन्तु नये जमाने की हवा बाबा के दो बेटों को लग गई। शिव को शराब-वैश्या की लत लगी, तो दूसरा बेटा भरत सिनेमा में काम करने केलिये देर रात तक घर से बाहर रहता। बाबा को इस बात की चिन्ता रहती, मगर किसी से कुछ कहते नहीं। बाबा ने सटीक विश्लेषण पूर्वक यह जान लिया था कि इस जीने की इस बदलती शैली के पीछे वर्तमान शिक्षा कारण है। बाबा की अपनी सन्तानें स्कूल से कालिज तक अलग-अलग स्तर पर पढ रही थी। मगर बाबा  शिक्षा-तन्त्र से संतुष्ट नहीं थे। व्यापार अच्छा चलता था, तो हर साल राजस्थान में जमीनें खरीदने लगे। तब जमीनें पानी के भाव मिला करती थीं, आजतो इन्हीं जमीनों के दामोंमें आग सी लगी है।
चार-पाँच वर्षों में ही सौ एकङ से अधिक जमीनें बाबा के नाम हो गई। तभी बाबा को पहला पोता(शंकर- पार्वती का बेटा दिनेश) हुआ। दिनेश तीन वर्ष का हुआ तो बाबा ने उसे किसी विद्यालय में दाखिला नहीं दिलाया। पोते दिनेश को लेकर बाबा और उनकी सह-धर्मिणी अपने इस फ़ार्महाऊस नुमा जंगलों में आ गये। गाँव तो तब तक बना नहीं था। चार-छः महीनों में ही बच्चे के माता-पिता शंकर-पार्वती आ गये। परिवार के बाकी सदस्य छुट्टियाँ मनाने यहां आते, तो देशी गायों का शुद्ध दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ पाते, अपने खेत में उगा अनाज खाते, अपनी ही सब्जियाँ-फ़ल पाकर धन्य हो जाते। खेतों पर काम करने वाले सहायकों का सरल व्यवहार उनका मन मोह लेता। दो साल बाद ही बाबा ने अपने सभी ग्यारह भाइयों के पूरे परिवार के साथ अपने परिजनों और मित्रों का सात दिन का मंगल-कुल-संगम आयोजित किया। इस संगम का सभी पर ऐसा प्रभाव पङा कि सभी के मनमें अपना-अपना शहर छोङकर बाबा के साथ रहने का मन बना लिया। देशके अलग-अलग शहरों में सबका अपना अपना व्यवसाय था। सभी ने अनुभव किया कि शहरों में जीवन एक बोर ढर्रे में ढल जाता हैं । चिन्ता, तनाव, गुस्सा, पेट की बीमारियां, सिर और आँख की बिमारियां आदि शहरी जीवन-शैली के अंग ही बन गये हैं। यहाँ जंगल में आकर बहुत अच्छा लगा और एक एक करके सभी बाबा के साथ आकर रहने लगे। मंगल-कुल-संगम प्रतिवर्ष का आयोजन बन गया, और इसमें अधिक से अधिक सँख्या में मित्र-परिजन आने लगे। एक आयोजन में गाँव का नामकरण भी सर्व-सम्मति से हो गया। भाइयों के परिवार भी जल्दी ही इस नये औसान गाँव में आकर बसने लगे। युवा पीढी आई तो कम्प्यूटर आदि नई विधायें भी आईं। इसी बीच बाबा को सहजयोग पूर्वक बोध हो गया। औसान गाँव धन्य हुआ। बाबाके बोध-अनुभव होनेका लाभ नया देह धारण करने वाली जीवन-इकाइयों को सहज ही मिलने लगा। बाबा को पहले से ही सब जन आदर करते ही थे, अब बाबा के निर्देशन में ही गाँव की सामाजिक व्यव्स्थायें आकार लेने लगीं। अभिभावक-विद्यालय बने। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर प्रयत्नपूर्वक श्रम हुआ। स्वावलम्बन की दिशामें अनेक प्रयोग हुये। प्रकृतिका सहयोग मिला। ॠतु-चक्र समय पर आता रहा, तो धरती ने भरपूर उपज दी। गौ-आधारित कृषि में जल-जम्मीन से जुङे कीट-पतंगे, पशु-पक्षी और जलचर परस्पर सहयोग पूर्वक बनते-बढते रहे। गाँव का वातावरण चारों दिशाओं में शुभ का संदेश देता, सबका मन मोह लेता।
सभी ग्यारह भाइयों के पास अपने-अपने व्यवसाय से प्राप्त धन काफ़ी था। अब तक सही जीने का रास्ता न जानने के कारण यह धन बोझ बना हुआ था, कई प्रकार की समस्यायें पैदा करता था। अब बाबा के सानिध्य से सही जीना आया तो उस धन का सदुपयोग हुआ, सबकी जागृति-क्रम में सहायक बन गया। सुविधा की सारी सामग्री औसान में उपलब्ध हो गई। सङकें, तालाब, कुये, सौर-ऊर्जा के पैनल, जल-संरक्षण  के प्रकल्प, सार्वजनिक पुस्तकालय, सार्वजनिक बैठक के लिये भवन खेल के मैदान एवं साधन, संचार-यातायात के उपकरण और आकस्मिक आवश्यकता के लिये हैलीकोप्टर। अस्पताल या विद्यालय भवन की आवश्यकता ही नहीं। बैंक के स्थान पर सामूहिक कोषा गार बनाया गया। पूरे गाँव की आवश्यकतानुसार सामान हाट-बाजार से आ जाता, और हर परिवार की पूर्व-निश्चित आवश्यकतानुसार उपलब्ध हो जाता। श्रम-कोष में सबके श्रम का हिसाब रहता है। वस्तु का विनिमय श्रम से चलता है। रुपये की भूमिका बहुत सीमित है। सिर्फ़ बाहर से किसी वस्तु की आवश्यकता होने पर पैसा खर्च हिता है, जो बहुत कम होती है। गाँव का अधिक उत्पादन बाहर बेचा जाता है, तब रुपया आता है। वर्ष भर की जमा राशि से  गाँव के सार्वजनिक उपयोग का कोई साधन बन जाता। उस साधन के निर्माण में भी परिवार भाव से ही सबका श्रम लगता। पैसा भी बहुत कम लगता, और काम की गुणवत्ता उत्तम होती। प्रकृति के स्वाभाविक चक्र के विरुद्ध औसान में कुछ भी नहीं किया जाता। … गोबर्चगैस हर घर के किये खाना भी पकाती, उसी से मोटर चलाकर कई घरेलू काम और मशीनों वाले काम भी कर लिये जाते। गोबर-गैस-संयन्त्र से जो स्लरी बनती, वह खेत में खाद रुपमें काम आ जाती। गोमूत्र से बनाया उच्च-कोटि का कीटनाशक फ़सलों को बचा लेता।
चौबीस
बारह दिन की स्मृति सभा में एक सज्जन व्यक्ति अपने संस्मरण सुना रहा है, “ मैं परमदासजी के पास बहुत प्रारम्भिक समय से आता रहा हूँ। तब वे मुम्बई से कभी-कभी आया करते। जमीनें खरीदते समय मुझसे सलाह-मशविरा कर लिया करते। अकेले ही होते, और यहाँ अपना घर भी नहीं बनाया था तो हमारे साथ ही रुकते। शहरों के बारे में बात करते, तो उनके मन की विरक्ति प्रकट होती। मिलावट की बातें, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की बातें, सरकारी तन्त्र के नाकारेपन, न्यायालयों की विवशता आदि की चर्चा करते हुये वे बैचैन हो जाया करते थे। ‘बाप बङा ना भैया, सबसे बङा रुप्पया’ मुहावरे को सच होते देखना उनको रुला देता था। लेकिन उनके आचरण और विचारों में इस अतिरेक को मैंने क्रमशः कम होते और मिटते देखा है। गत बीस बाईस वर्षों में तो उनके चेहरे या भावों में गुस्सा, चिन्ता, तनाव आदि कुछ भी नहीं रहा। देश-विदेश की सारी घटनायें-दुर्घटनायें बाबा जानते, मगर उनके लिये जैसे वे सूचनायें मात्र होती। वे कहा करते थे कि मानव जब तक होश में नहीं आयेगा, तब तक तो ऐसी-वैसी दुर्घटनायें होती ही रहनी है। बाबा की स्थिरता में कोई अङचन नहीं देखी गई। मैं यह तो नहीं जानता कि जागृति पाना क्या होता है, जागृत मानव के क्या-क्या लक्षण हैं… किन्तु यह अवश्य कह सकता हूँ कि किसी भी परिस्थिति में बाबा को उदास, चिंतित और परेशान नहीं देखा। आस-पास गाँवों में यह आम-चर्चा का विषय रहा है कि बाबा सदैव आनन्द में रहते हैं। उनको कोई शारीरिक व्याधि भी रही, तब भी उनकी स्वाभाविक प्रसन्नता में व्यवधान नहीं आया। पूछने पर वे कहा करते थे कि व्याधि शरीर का लक्षण है, आती-जाती रहती है। हर बार चिकित्सा स्वयं ही करते, स्थानीय जङी-बूटी या खान-पान की सामग्री से ही करते। स्वावलम्बन के प्रति उनका सहज आग्रह रहा। अन्तिम साँस तक उत्पादन में उनका योगदान रहा। शिक्षा,स्वास्थ्य,सुरक्षा, और संस्कार की दिशा में उनका योगदान सर्वोच्च होते हुये भी श्रम-पूर्वक स्वावलम्बन की साधना उनका वैशिष्ठ्य है। घर के पास ही अपनी बाङी में वे नये-नये प्रकार के औषधीय पौधे लगाते, उनपर प्रतिदिन कोई न कोई संस्कार करते। यही औषधियाँ बाबा के स्वावलम्बन का सूत्र बनी। आस-पास अनेक ग्रामों से आने वाले रोगियों को आश्वस्ति है कि बाबा की औषधि उनको निरोग बनाती है। बाबा गरीबों से पैसा नहीं लेते। बाबा को निरपवाद आदर-सम्मान मिला है। इतना सब होते हुये भी हम नहीं जानते कि दूर-दूर तक बाबा का आदर करने वाले इतनी बङी सँख्या में लोग हैं। यहाँ बाहर से आये बन्धु जितनी सँख्या में हैं, उससे कई गुना ज्यादा पत्र, मेल और फोन आये हैं, आते ही जा रहे हैं। हमारे लिये तो बाबा एक घर के बङे की तरह रहे-जिये।”
पच्चीस
माथुर साहब ने अभिषेक से बाबा के सम्बन्ध में जानना चाहा, तो अभिषेक ने उन्हें कैलाश बाबा के सामने कर दिया। भगवतीजी से भी काफ़ी कुछ जाना। अपनी उम्र का पूरा शतक इतनी विविधता पूर्ण गरिमा पूर्वक जीते हुये जीवन-लक्ष्य को प्राप्त व्यक्ति अनायास जागृति-प्रेरणा बन जाता है। वर्षों का सरकारी अफ़सरी रंग कलई की तरह उतरने लगा। माथुर साहब का मन वैरागी सा हुआ और लगातार बारह दिनों तक वे बाबा के संस्मरणों में डूबते-उतराते रहे। संस्मरण बताने वाले अत्यन्त सामान्य बात सामान्य शब्दों में भी कहते मगर माथुर साहब को हर बार उसमें दिव्यता दिखाई देती। कैलाश बाबा के साथ वे अधिक से अधिक समय बिताने लगे। कैलाश बाबा का आचरण व्यवहार स्वाभाविकतया ही दिव्यता लिये था; इधर माथुर साहब की स्वीकार्यता अपने चरम पर थी; परिणामतः माथुर साहब को अपने विगत उपलब्धियों और अधिकारों की पाशविकतायें स्पष्ट होने लगीं। सरकारी तन्त्र की एक-एक बात में अव्यवस्था और अन्याय दिखने लगा। औसान गाँव उनको वैकल्पिक व्यवस्थाओं के लिये आदर्श लगा। जागृति-क्रम का आस्वादन कृतार्थता और कृतज्ञता का बोध देता है। अपनी साली मेनका, उनकी सहेली वैदेही, श्रेया, उसकी पूरी टोली, जयपुर आग का घटना-क्रम आदि सभी के प्रति उनके मनोभावों में अपूर्व परिवर्तन आया। इन सबके निमित्त ही माथुर साहब ने दिव्य-जीवन की संगति पाई है, तो सबके प्रति कृतज्ञता जागा। यहाँ प्राप्त पारिवारिक सम्बन्धों की सुगन्धमय दर्पण में अपने इर्द-गिर्द शिकवा-शिकायत भरे रिश्तों की दुर्गन्ध महसूस की। स्वीकारा कि इतने बङे सरकारी पद-ओहदे के बावजूद उनके पास एक भी विश्वासी मित्र नहीं है। जैसा विश्वास, स्नेह, कृतज्ञता, औसान के प्रत्येक व्यक्ति के आचरण में दिखाई देती है, वह तो माथुर साहब के लिये स्वप्न में भी अकल्पनीय थी। इसे प्रत्यक्ष देखना एक रोमाँचकारी स्वर्गीयता का अहसास देता है।
माथुर साहब मन ही मन अपने सभी निकटस्थों और परिजनों को याद करके उनको फ़ोन करते। औसान आने का निमन्त्रण देते, लम्बी देर तक प्रमुदित भाव से जयपुर से औसान तक आने के घटना-क्रम की छोटी-छोटी बातें बार-बार दोहराते।
“कमाल है! जो मित्र मेरा फ़ोन पाकर ही गद्गद हो जाया करते थे, वे मेरी इतनी महत्वपूर्ण बात पर ध्यान क्यों नहीं दे रहे? कल तक मेरे बुलावे पर सिर के बल दौङे चले आते थे, आज इतनी बार फ़ोन करने पर भी कुछ नहीं? हद हो गई!” –दसवें दिन अपना दर्द अभिषेक को बताया।
“तब भी कोई आपकी बात नहीं सुनते होंगे, कमिश्नर का आदेश सुनते होंगे! अभी आप सस्पेंडेड हैं। अभी बात सुनने से लाभ नहीं, ना सुनने से हानि नहीं। विचार लीजिये, सारा मामला भय-प्रलोभन का था। मित्रता या विश्वास की कहीं कोई बात थी ही नहीं। सरकारी तन्त्र में विश्वास और वफ़ादारियाँ परिस्थिति अनुसार बदलती रहती हैं।” – अभिषेक का यह उत्तर सुनकर माथुर साहब के मनमें नई जिज्ञासा बनी।
“इतनी कम उम्र है तुम्हारी। और औसान के विश्वास पूर्ण परिवेष में तुम पले-बढे हो। यहाँ सरकार का नामो-निशान नहीं है, फ़िर भी उलझन-पूर्ण मानवीय रिश्तों के बारे में इतने विश्वास से कैसे कुछ कह लेते हो यार? किससे पाई यह विद्या? क्या बाबा ने दिया है यह मनोविज्ञान का पाठ?” माथुर साहब अभिषेक के कंधे पर हाथ रखकर दोस्ताना लहजे में पूछ बैठे।
अभिषेक ने देखा कि कि माथुर साहब का साहबी अन्दाज पिघल रहा है। वर्षों तक एक पूरा संस्थान बना पशु-मानव आज एक सरल-ह्रदय व्यक्ति के रूप में उभर रहा है। “अशेष मानव 51% सही है। हर मानव सही को स्वीकार करता है। हर मानव सही होना ही चाहता है।” बाबा के कहे ये शब्द अभिषेक को माथुर साहब के रूप में सत्यापित हुये लगे।
वातावरण और परिवेष सही मिले तो हर मानव सही जानना ही चाहता है। सही के लिये स्वीकृति ज्ञानावस्था की इकाई हर मानव में जन्मजात है। हर बच्चा वैसा ही बन जाता है, जैसे उसके अभिभावक होते हैं। जैसे हिन्दी-भाषी परिवार में जन्मा बच्चा हिन्दी-भाशी हो जाता है, अंग्रेज बोलते ही अंग्रेजी बोलने लगता है। खान-पान, पहनावा, उठने-बैठने-सोने-जागं ने का तरीका, रीति-रिवाज और मान्यतायें आदि सब अपने परिवेष से ही सीखता है। मुझे यहाँ जैसा परिवार/परिवेष मिला, वैसा मैं या मेरे अन्य साथी बने हैं। इसमें यदि आप मेरी तारीफ़ करना चाहें तो आपकी मर्जी है,…………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………
प्रत्यक्ष में अभिषेक मुस्कुरा भर दिया।
छब्बीस
आशित-कमलेश के घर के दालान में कक्षा छः की पर्यावरण विषय का अभ्यास चल रहा है। जेठ महीने की शुरुआत, भीषण गर्मी का मौसम है। सारे बच्चे प्रातः छह बजे ही नहा-धोकर पहुँच जाते हैं। नाश्ते की किसी को चिन्ता नहीं रहती। जहाँ अध्ययन चलता है, ठीक समय पर उसी घर में मौसम के अनुकूल ताजा पौष्टिक और रुचिकर नास्ता/भोजन सहज ही मिल जाता है। आश्विन-जेठ माह में प्रातः की कक्षायें आशित-कमलेश के घर पर लगना तय हुआ। डेढ घंटा तक कमलेश सामान्य-ज्ञान पढाते हैं, तब तक आशित और अन्य परिजन सबके लिये नाश्ता तैयार करते हैं। नाश्ते के बाद आशित उन बच्चों को अनेक प्रकार की हस्त-कलायें सिखाती हैं। साढे नौ बजे कङी धूप निकलने से पहले सारे बच्चे आम-पन्ना का शर्बत पीकर अपने घर के लिये निकल पङते हैं। संध्या धूप ढलने पर अन्य स्थान पर अन्य दो कक्षायें लगती हैं। गर्मी मे दोपहरी में सारे बच्चे अपने-अपने घर में खस-खस की टाट-पट्टी जनित खूशबूदार शीतलता का आनन्द लेते हैं।

“बोलो बच्चों! कल किस बात पर अध्ययन चला?”-कमलेश ने सारे बच्चों के व्यवस्थित पंक्ति-बद्ध बैठने के बाद मुस्कुराते हुये पाठ आरम्भ किया।
“वर्ष में बारी-बारी से तीनों मौसम और छः ॠतुयें आती हैं। इसीको ॠतु-चक्र कहते हैं। हर ॠतु का खान-पान, वस्त्रालंकार और दिनचर्या अलग होती है। आपने इस बारे में कुछ नियम लिखवाये। घर जाकर हमें इन नियमों का निरीक्षण-परीक्षण करना था।” एक बालक ने उत्तर दिया।
“मैंने अपनी दादीजी से खान-पान के नियमों की चर्चा हुये पूछा कि सर्दीयों में आम क्यों नहीं होते?” – एक बालिका के इस प्रश्न पर पूरी कक्षा ठ्टा कर हँस पङी।
“हा—हा—हा—हा … हँसना तो बहुत अच्छा व्यायाम है। अभी तुम सबके पेट भी खाली हैं, तो खुल के हँस लो, भूख भी खुल जायेगी। मगर क्या यह प्रश्न  गलत है? या फ़िर क्या आप सबको, या किसी एक को भी इस प्रश्न का उत्तर पता है?” कमलेश ने बच्चों के साथ लय मिलाते हुये पूछा।
“अरे, यह कैसा प्रश्न है? सर्दियों में तो मजेदार सब्जियाँ और सूखे मेवे आते हैं। उस समय आम को कौन पूछेगा? फ़लों का राजा आम क्या बिना स्वागत के ही आ जाया करे?” – दूसरे बालकने चहक कर कहा। कक्षा फ़िर ठहाके से गूँज उठी।
“ओ हो! यह राजा-प्रजा की बात कहाँ से आ गई? क्या फ़लों-सब्जियों और फ़ूलों-वनस्पति में भी यह भ्रमित-मानवीय दोष स्वीकृत हो जाता है? मेरे दादाजी ने तो एक बार मेरी चाची को मना कर दिया था कि वह मुझे राजा-रानी की कहानी ना सुनाया करे, क्यों कि इससे मेरे मन में राजा बनने की भ्रम-पूर्ण इच्छा पैदा हो सकती है। तो आम को फ़लों का राजा किसने और कब बनाया?” एक बालक ने नया ही प्रश्न खङा कर दिया।
“तुमने बिल्कुल सही बात कही है। न प्राणावस्था में कोई राजा-प्रजा मूलक ऊँच-नीच की व्यवस्था है, न मानवों में होनी चाहिये। ज्ञानावस्था के सभी मानव समान हैं। मानव भ्रमित अवस्था में ही भ्रम-पूर्ण शासन को व्यवस्था के नाम पर स्वीकार करता है। जागृत-सार्वभौम समाज-व्यवस्था में सारे मानव स्वयं समझपूर्ण आचरण सहित व्यवस्था में रहकर अपने से बङी व्यवस्था में भागीदारी निभाते हैं। भय-प्रलोभन आधारित राजकीय तन्त्र की न आवश्यकता रहती है, न ही कोई उस दिशा में प्रयत्न होता है। ज्ञानावस्था के सिवा अन्य तीनों अवस्थाओं में तो प्रकृति-सहज नियम-नियन्त्रण पूर्वक सब परस्पर सह-अस्तित्व में रहते हुये विकास-क्रम में सक्रिय रहते हैं। अतः आम को फ़लों का राजा कहना गलत है, शेर को पशुओं का राजा कहना भी गलत है। अब अपने मूल प्रश्न पर आ जायें। प्रश्न यह था कि सर्दियों में आम क्यों नहीं होता? जिस उत्तर को आप सबने हँसी में उङा दिया, उसके पहले भाग का फ़िरसे निरीक्षण-परीक्षण करते हैं। ‘सर्दियों में मजेदार सब्जियाँ और सूखे मेवे आते हैं, उस समय आम को कौन पूछेगा?’ इस बिन्दु पर जरा सोचकर देखते हैं। इसमें ही प्रश्न का उत्तर छिपा है।” – कमलेश ने बच्चों को सोचकर बोलने की प्रेरणा दी।

“हर मौसम में मानव के लिये उपयोगी और हितकर वस्तुयें प्रकृति पैदा करती है। इस नियम के समर्थन में मौसमी फ़ल-सब्जियाँ ही सबको स्वादिष्ट लगती हैं, वही स्वास्थ्य के लिये हितकर होती हैं।” एक बालिका बोली।
“बिल्कुल सही कहा। और कोई बताये?” कमलेश ने उत्साह बढाया।

इन दो महीनों आश्विन और जेठ में सूरज बहुत कङी धूप देता है। नौ बजते-बजते शरीर उमस से जलने लगता है। अधिकांश लू लगने की संभावना रहती है। मेरी दादीजी कहा करती हैं कि कच्चे आम और पुदीने को पकाकर ठंडा किया गया आम-पना लेने से लू का बचाव हो जाता है। इसीलिये सब आम का स्वागत करते है।” –एक बच्चा बोला।
“लू से बचने के लिये तो मेरे दादाजी इससे भी सरल उपाय बताते हैं। कहीं भी बाहर निकलते समय अपनी जेब में प्याज रख लो, लू लगेगी ही नहीं।” एक अन्य बालिका बोली। कक्षा को फ़िर हँसने का बहाना मिला।
“आम की बात में प्याज भी घुस पङा…” किसी छात्र ने बालिका का मजाक बनाना चाहा, तो कमलेशजी ने उसे टोका-
“यह प्रवृत्ति सही नहीं है। किसी का भी मजाक बनाना गलत है। हर मानव सम्मान चाहता है। कक्षा में अध्ययन-काल में हर छात्र की सक्रिय भागीदारी होना अपेक्षित है। और प्याज का जिक्र मौसम और स्वास्थ्य के सन्दर्भ में ही है, इसमें कोई विषयान्तर भी नही है। कभी विषयान्तर हो जाये, तब भी किसी का मजाक बनाना सही नहीं। क्या आप सब इस बातसे सहमत हैं?”
सारे बच्चों ने समवेत स्वर में हामी भरी। सन्दर्भित बालक-बालिका एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिये। किसी को माफ़ी माँगने/माफ़ करने/नाराज होने का प्रश्न नहीं रहा। कक्षा आगे बढ गई।

कक्षा में अतिथि के नाते बैठे माथुर साहब मन ही मन में इन बच्चों की तुलना शहर के मँहगे विद्यालयों के छात्रों के साथ करने लगे। यहाँ के बच्चे स्वयं अपने प्रश्न का उत्तर अपने परिवेश से समझकर देते हैं, जबकि शहरी शिक्षण विधा में न प्रश्न अपना होता है, न उत्तर। प्रश्न भी उधार का और उत्तर भी उधार का! रट-रटा कर कक्षायें पास करते हैं, जीवन से चूक ही जाते हैं। पूसरी की पूरी पीढी स्वयं एक बङा प्रश्न बनकर खङा हो जाती है, जिसका उत्तर किसी के पास नहीं होता। जिस शिक्षा-तन्त्र को देश-समाज की समस्याओं के हल ढूँढने के लिये उत्तरदायी माना जाता है, वह स्वयं में एक अत्यन्त खर्चीली समस्या बन कर रह गई है। सारे धर्म-नेता सहित शिक्षाविद और समाज-शास्त्री जहाँ आकर निरुत्तर और हताश नजर आते हैं, वहीं औसान गाँवका आम मानव सहज विश्वास पूर्वक समाधान के धरातल पर निश्चिन्त खङा है।
सत्ताईस
कक्षा अभी जारी है। अभिभावक शिक्षक कमलेशजी के सानिध्य में कक्षा छः के छात्र ॠतु-चक्र के प्रयोजन और उपयोगिता पर अध्ययन-रत हैं। न कोई पुस्तक न कोई नोटबुक-पेन। अपने घर-गाँव-परिवेश और स्वयं से बनते प्रश्न और अपने परिवेश से मिले समाधान को सर्व-सामूहिक स्वीकृति सहित सब स्वीकारते हैं। यह स्वीकार परस्पर आचरण पूर्वक भावी यात्रा की पूँजी बन जाता है।

“जेठ के बाद ही श्रावण-भादो मास लग जाता है। आश्विन/जेठ की उमस भरी गर्मी और आमों की बहुत चर्चा हुई। अब सावन के झूलों/बारिश और मानसून की बात करेंगे। आप सब यह तो जानते ही हैं कि हवायें गर्म होकर हल्की हो जाती हैं। हल्की होने से धरती से दूर ऊपर की ओर उठ जाती हैं। इस प्रकार धरती के एक हिस्से में हवा का दवाब कम हो जाता है। इस कमी को भरने समुद्र की शीतल हवायें तेजी से उङकर आती हैं। इन तेज हवाओं को मानसून की हवायें कहा जाता है। मानसून तेज हवाओं के साथ पानी से भरे बादलों को भी खींच लाता है। ये बादल अनेक कारणों से धरती पर बरसते हैं, तभी मानसून कहते ही बारिश की सूचना मान ली जाती है। अब आप सब बरषात के आनन्द और उपयोगिता पर बात करें। हमारी कक्षा की अवधि सिर्फ़ बीस मिनट बची है, प्रत्येक छात्र एक-एक बात बताये। विस्तारसे चर्चा कल करेंगे।” कमलेशजी ने प्रस्तावना की।

“बरषात में ऊँचे पेङों की डालों पर झूले लगते हैं। झूलों पर ऊँची पींग चढाने में बहुत मजा आता है” अन्तिम पंक्ति का दाहिने कोने का पहला छात्र बोला।

क्रमशः दूसरा,तीसरा करते अपनी बारी से एक-एक बात बोलकर स्वतः बैठते रहे।
“खेतों में बुआई शुरु हो जाती है।”
“बगिया में नये-नये फ़ूलों की बहार आ जाती है।”
“घर के सब पुरुष खेतों में जाते हैं। बच्चे और महिलायें घर के सारे बढे हुये काम संभालते हैं।”
“हम लोग बारिश का आनन्द लेते हुये गली की नालियाँ-सङकें साफ़ कर देते हैं।”
“छतों का सारा पानी घर की कुण्ड में भर लेते हैं। यही पानी सालभर पीने के लिये और गाय-भैंस आदि पशुओं को पिलाने के काम आता है। नहाने-धोने का पानी तालाब से आता है।”
“बरषात से पहले तालाबों की सफ़ाई और मरम्मत होती है, ताकि उनमें अधिक जल जमा हो सके। हमारे गाँव से पानी बहकर बाहर ना जा पाये, इसका पुख्ता इन्तजाम जल-संरक्षण समिति करती है।”
“बरषात में मेंढकों की टर्र-टर्र और झींगुरों की चूँ-चूँ सुनने को मिलती है।”
“ सुनहरी भीगी रेत पर सावन की मखमली डोकरी का चटक लाल रंग बहुत सुहाना लगता है।”
“पहली बारिश की खुशी पूरा गाँव सहभोज पूर्वक मनाता है। घर से दूर खेतों में पिकनिक होती है।”
“ पूरी धरती हरियाली चादर और रंग-बिरंगे फ़ूलों से सज जाती है। पदार्थावस्था और प्राणावस्था के इस उत्सव का आनन्द जीवावस्था और ज्ञानावस्था को प्राप्त होता है।”
“मोर नाचते हैं। पपीहे और कोयल की मीठी तान सुनाई देती है। बगिया रंग-बिरंगी तितलियों से भर जाती है।”
“गाय-बछङों को हरी-हरी घास बहुत पसन्द है। गायें खुश होकर रम्भाती हैं, बछङे चौकङियाँ भरते हैं।”
“ज़मीन पर रेंगने वाले कीङों को अपने-आप पंख लग जाते हैं। शाम ढलते ही ये पतंगे रोशन दीपकों के चारों तरफ़ मँडराते हैं, जल जाते हैं। पंख लगने के बाद अल्प-काल में ही ये कीङे/पतंगे अपनी जीवन-लीला मर कर समाप्त कर लेते  हैं।“
“इस मौसम में कवित्व फ़ूटता निखरता है। नये कवि अपनी पहली रचना का रोमाँच पाते हैं, तो पुराने कवि अपनी सजी-सँवरी नई कवितायें पेश करते हैं।” – यह प्रथम पंक्ति का अन्तिम छात्र है।
कमलेशजी ने कक्षा का समारोप करते हुये दो बातें कहीं।
पहली बात – बरषात के कीट-पतंगे प्राणावस्था की इकाई हैं। उनमें जीवन नहीं होता, अतः इनके लिये ‘मरने’ की संज्ञा का प्रयोग अतिरेक है।
दूसरी बात – गत वर्ष अपने जिले के 703 गाँवों में से कुल 33 कवियों की रचनायें राष्ट्रीय स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई या रेडियो, दूरदर्शन पर उनका प्रस्तुतीकरण हुआ। अपने इस गाँव के भी दो छात्रों की रचनायें प्रकाशित/प्रशंसित हुई। कल आप सब उन सब कवियों के नाम देखकर आएंगे। औसान के छात्रों की कवितायें याद करके आयेंगे।”

सामूहिक सस्वर शान्ति-पाठ से कक्षा का समारोप हुआ।
अट्ठाईस
जयपुर आग-प्रकरण से औसान गाँव भले ही उभर आया हो, किन्तु मीडीया जनित राजनैतिक हलचल में अन्ततः मुख्य-मन्त्री को त्यागपत्र देना पङा। मध्यावधि चुनावों की घोषणा हो गई। जाते-जाते मुख्य-मन्त्री ने विरोधी दल के प्रमुख नेताओं द्वारा पूर्व-कृत घोटालों की फ़ाईलें खोलकर जाँच-आयोग बिठा दिया। आम-चर्चा का विषय गया कि इसबार नागनाथ आयेंगे या साँपनाथ? नोट-वोट की साँठ-गाँठ का मुहावरा वर्तमान में कार्य-रुपायित हो गया, तो औद्योगिक घरानों और बहु-राष्ट्रीय निगमों के साथ नीति-विरुद्ध (अनैतिक) समझौते करके बङी धनराशि उगाहना राजनैतिक दलों की विवशता हो गया है। आगे चलकर यही विवशता नई मुद्रा छापने को बाध्य करती है। इस मुद्रा का अधिकांश हिस्सा अन्तर्राष्ट्रीय गिरोहों के हाथों जाकर अवैध हथियार, नशा, अपहरण आदि अपराधों से होते हुये विदेशी बैंकों में जमा हो जाता है। ये बैंक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष होते हुये अविकसित/ विकासमान देशों की मदद के नाम पर भ्रष्टाचार का नया दल-दल तैयार करते हैं। इस क्रम में मुद्रा स्वयं में निर्मूल्य होते हुये भी सरकारों, प्रशासन, व्यापार-उद्योग, शिक्षा-तन्त्र और साधु-सन्त समुदाय आदि सब पर हावी हो जाती है।  सर्व-सामान्य में प्रचलित मजाकिया कहावत ‘बाप बङा ना भैय्या, सबसे बङा रुपय्या’ समाज का सच बन जाता है। व्यक्ति के नाते सारे ही जन रुपये की इस दुरभिसंधि को साफ़ देख पाते हैं, किन्तु समाज के काल्पनिक भय से बन्धे इस दुश्चक्र का हिस्सा बन जाते हैं। इस दुश्चक्र से जो जागृत मानव बाहर निकलने का प्रयत्न करता है, उसे भ्रष्ट धन-सत्ता-अफ़सर और माफ़िया गठजोङ या तो पुनः अपने दुष्ट घेरे में लेने का प्रयत्न करता है अथवा फ़िर मिटा देने की कोशिश करता है।

जिला मुख्यालय से पुलिस ने आधी रात के बाद औसान गाँव में प्रवेश करके अभिषेक, अजय, शंकर, श्रेया, वैदेही और मेनका को गिरफ़्तार कर लिया। आनन-फ़ानन में सारा गाँव जाग गया। माथुर साहब ने तत्काल अपने उच्च पदस्थ विश्वस्त साथियों से फ़ोन पर पता किया। आस-पास इलाके के राजनेताओं के फ़ोन भी रात में ही खङखङाये गये। दिल्ली गृह-सचिव स्तर तक सम्पर्क बनाया गया। पता चला कि सभी को केरल सरकार के आदेश से न्यायिक हिरासत में लिया गया है एक विशेष हेलिकोप्टर से सीधा कोचीन ले जाया गया है। सभी छः जन पर अलग-अलग आपराधिक धारायें लगाई गई हैं। शंकर और अभिषेक पर केरल से चले विस्फ़ोटक पदार्थों की तस्करी और भण्डारण का आरोप बताया, अजय और श्रेया पर इस कारोबार में सहयोग-हिस्सेदारी का शक बताया। मेनका के नाम केरल में एक विशाल भू-खण्ड पर स्थित गेस्ट हाऊस में कुछ काल-गर्ल रेकेट पकङा गया था। उसी सिलसिले में पूछ-ताछ के लिये मेनका और वैदेही को धरा गया। माथुर साहब ने तत्काल जान लिया कि सारे षङयन्त्र में बहुत बङे लोग और अनजान संगठन शामिल हैं। मामला उनकी पहुँच से बाहर का है। वे इस समय यदि अपने पद पर भी रहे होते तो इस मामले में कुछ भी ना कर पाते, बल्कि इस सस्पेडेड अवस्था में स्वयं उनको भी आसानी से किसी भी आरोप में धरा जा सकता है। अपने परिजन-मित्रों को आवश्यक सूचनायें एवं दिशा-निर्देश देकर माथुर साहब अभिषेक के साथियों की मदद से भूमिगत हो गये। ज्योतिषी राम और कैलाश बाबा के परामर्ष अनुसार ग्राम-सुरक्षा-समिति-प्रमुख भँवरलाल के नैतृत्व में समाधान-दल का गठन और कार्य-योजना तय हो गई। बिना किसी औपचारिक घोषणा के बच्चे-बूढे स्त्री-पुरुष सभी अपनी-अपनी भूमिका में जुट गये।

रात्रि एक बजे हुई आकस्मिक गिरफ़्तारी में लिप्त व्यक्तियों और समूहों की कुण्डली बनाने बैठ गई औसान की अन्तरताना-विशेषज्ञ बच्चा-टोली। जयपुर में आनन्द और अरुण खबर लगते ही अपनी टोली के साथ सक्रिय हुये। अरुण ने अपने पिता की आवाज में बात करते हुये केरल प्रान्त के सी आई डी प्रमुख के साथ तालमेल बनाया। सी आई डी को पहले से खबर है। बाबा परमदास की फ़ाईल इन्होंने देखी/समझी तो जान गये कि सारा मामला ही फ़र्जी है। अरुण ने अपना सही परिचय खोलते हुये जयपुर आग-प्रकरण में अभिषेक की असामान्य भूमिका का जिक्र किया तो सी आई डी अधिकारी के भीतर बैठा सही मानव अनौपचारिक तौर पर सहायता करने को तैयार हो गया।

भँवरलाल के नैतृत्व में प्रातः छः बजे विक्रम,अमित श्रवण, नितिन और कम्प्युटर-टीचर (?) बैठे। कैलाश बाबा अपनी सह-धर्मिणी हीरा और भाई राम के साथ परामर्शक के रूप में बैठे। सभी ने पहले अपनी-अपनी सूचनाओं का आदान-प्रदान किया।
•    विक्रम की टोली ने पता लगाया कि गिरफ़्तार करके कोचीन ले जाने की सूचना गलत है। उनका काफ़िला गाँव से चालीस किलोमीटर दूर पहाङियों की तलहटी में बने खण्डहर में छिपा है। चारों तरफ़ तीस के लगभग वर्दीधारी और शताधिक अफ़सर सामान्य नागरिक वेश में चौकस है। अजय अपने चुने हुये सात युवकों के साथ छिपकर उनपर नजर रक्खे है। तीनों महिलाओं की सुरक्षा के बारे में ज्यादा चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं है, अभिषेक और उसके दोनों साथी मिलकर किसी भी विषम परिस्थिति का सामना कर लेंगे।
•    केरल के जिस न्यायाधीश ने गिरफ़्तारी के आदेश दिये; उसके बारे में भारती, मीनाक्षी ने अन्तरताने पर पता लगाया है कि इनका एक माह पूर्व ही रिटायरमेन्ट हो गया है। अभी वे सपरिवार कनाडा में अपने बेटे-बहू के साथ हैं। संभव है कि आदेश पत्र पर किसी ने उनके नकली हस्ताक्षर किये हों।
•    माथुर साहब के बताये अनुसार इस षङयन्त्र में सक्रिय मुख्य कार्यकारी आफ़िसर के सारे सम्पर्कों की पङताल आदेश्वर ने की है। अपने फ़न में माहिर है, किन्तु हद दर्जे का रिश्वतखोर है। अभी हाल में ही किसी बङी डील से प्राप्त 7000 करोङ उसने मारिशस की एक कम्पनी में बेनामी भागीदारी में लगाये हैं। इस कम्पनी ने भारत के चयनित गाँवों में इन्दिरा आवास योजना के अन्तर्गत भवन-निर्माण का पचास हजार करोङ का ठेका लिया है। इस आफ़िसर के काले कारनामों की फ़ाईल गृह-मन्त्री कार्यालय में अरसे से दबी पङी है।
•    जयपुर से अरुण से प्राप्त सूचनाओं का सार-संक्षेप यह है कि इस अभियान के सूत्र सीधे केन्द्रीय सरकार और सत्तारूढ दल के अध्यक्ष से जुङते हैं।
•    सभी स्तरों पर हमारी टीम सक्रिय है। किन्तु जिस-तिस की मदद माँगना सही नहीं होगा। इससे मामला और उलझकर हमारे हाथ से निकल सकता है। माथुर साहब के आने से प्रशासनिक स्तर पर जो नये सम्पर्क बने हैं, उनमें से सावधानी और प्रयोजन सहित मदद ली जा सकेगी।
•    पहले इस बात का पता लगाना चाहिये कि केन्द्रीय सरकार को इस प्रकरण से क्या लेना-देना है? जयपुर प्रकरण में सक्रिय मुख्य व्यक्तियों की गिरफ़्तारी अनुमान होता है कि सरकार उनसे अपनी कोई खास समस्या हल कराने में मदद लेनेका सोच रही हो। इन सबका नुक्सान करने या इनको दण्डित करने का कोई कारण/प्रयोजन दिखता नहीं है। भारत सरकार अपनी अन्दरूनी समस्याओं से भी घिरी है, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में भी कई आयामों में अनेक देशों के साथ उलझनें हैं। यह पता करना है कि किन-किन समस्याओं के समाधान में अभिषेक और वैदेही का उपयोग सरकार कर सकती है?
•    काफ़िले पर अजय की पैनी नजर तो है, मगर हेलीकोप्टर अभी वहीं खङा हुआ है। रात में आकाशीय उङान सुरक्षित नहीं है, इसी कारण यहाँ पङाव लिया है। इसमें उनके अनिश्चित-मना होने की बात नहीं है। हम किसी प्रकार उनको यहाँ से छुङा भी लें तो समस्या और उलझनी है। अजय से कह दिया जाये कि वह अतिरिक्त उत्साह में आकर ऐसा कुछ ना करे, जिससे गिरफ़्तारी अभियान में लगा तन्त्र बौखला जाये। हाँ, हवलदार दीवानसिंह के माध्यम से यह नजर रक्खी जा सकती है कि यह है कि हेलीकोप्टर जाता किधर है। हवलदार दीवानसिंह के मित्र राजीवजी अभी यहीं हैं। उनसे सारी बात उपयुक्त गुप्तता रखकर करना होगा। अतिरिक्त उत्साह में उनके द्वारा बाधा आना संभव है।
•    अपने जिले के सभी गाँवों में अब तक यह खबर पहुँच गई है। इसे लेकर अफ़रा-तफ़री होना अनुचित है। सब जगह तत्काल सूचना दी जाये कि बिना चिन्ता किये सामान्य अवस्था बनाये रक्खें। अपने गाँव पर प्रशासन की कङी नजर है, उनको सबकुछ सामान्य दिखना चाहिये। अपने फ़ोन भी टेप हो रहे हैं, कोई भी फ़ोन या मेल पर गंभीर सूचनाओं का आदान-प्रदान ना करे। जिले के सब गाँवों को व्यक्ति भेजकर ही सूचना देनी है।
•    अब हम इस प्रकार मीटींग नहीं करेंगे। सारी योजना का क्रियान्वयन व्यक्तिशः सँवादपूर्वक करना होगा। अब से भँवरसिंह जी भी भूमिगत रहेंगे।
इस प्रकार तात्कालिक तौर पर स्थिति की समीक्षा करके मीटींग समाप्त हुई।
उन्नत्तीस
प्रातः छ्ह बजे ही सारे बच्चे कमलेश आशित के दालान में आकर व्यवस्थित बैठ गये। कल इस समय की कक्षा कमलेशजी ने ॠतु-चक्र पर ली थी, डेढ घंटे बाद नाश्ता करके दूसरी कक्षा आशित ने ली थी। आशित बच्चों को हस्तकलायें सिखाती हैं। कल की कक्षा में खस-खस की टाटी बनाना, जली तीलियों के बचे टुकङों और खाली माचिस के डिब्बों से फ़ल-सब्जी-दान बनाना और रद्दी अख्बार से थैले बनाना सिखाया था। आज  का पाठ पहले से ही तय है। आसन्न सावन-भादो के महीने में उपलब्ध हरियाली-झूलों और प्रकृति-प्रदत्त साधनों का कलात्मक उपयोग आज का विषय है।
शान्ति-पाठ के बाद एक लङका खङा हुआ। अपने हाथ का बना रद्दी अख्बार का थैला और टाटी बनाकर लाया था। थैले के दोनों तरफ़ रद्दी हुये विवाह-कार्ड के कवर चिपका दिये, सुन्दरता बढ गई। उसी थैले में अपनी पढाई की पुस्तकें,कोपी व अन्य सामान ले आया था। तीन-चार किलो वजन झेलने जितना मजबूत बना है थैला। सूखा ही उपयोग में लिया जाये तो महीने भर चल सकता है।
“महीने भर बाद जब यह फ़ट जायेगा, तब उस रद्दी का क्या उपयोग है?” – आशित ने हँस कर पूछा।
“रद्दी अखबार का थैला बनाया। फ़िर दोबारा रद्दी हुआ, उसका भी उपयोग? क्या यह समय-श्रम और साधनों का अपव्यय नहीं है चाची?” – एक छात्रा ने जिज्ञासा की। आशित ने पूरी कक्षा पर नजर डाली। छात्र समझ गये कि इसका उत्तर उनको ही देना है।
“मुझे भी यही लगता है चाची। यह थैला बनाने में भी सारा सामान आदि जुटाने और इसे तैयार करने में दो-ढाई घंटा लग गया। मेरा मन करता है कि इस समय में मैं कोई नई कहानी-कविता रच लेता। मुझे उसमें रुचि है।” पहले बालक को अपनी बात का समर्थन मिला, तो उसका गला थोङा और खुल गया।
“मैं इन दोनों से असहमत हूँ। कक्षा में विषय निर्धारण के अनुरूप ही सबको सीखना चाहिये। व्यक्तिगत रुचियों के अनुसार पढाई


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