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आशा है सबके मन की; सभी चाहते हैं; के वे सुखी रहें, जीवन में कोई अभाव न हो; कोई रोग या शोक न हो। किसी की यह आशा कभी पूरी नहीं होती, अर्थात यह आशा सही नहीं है। अपने लिए आशा करना सही नहीं होता, उसके पूरा होने की व्यवस्था अस्तित्व में नहीं है। आशा ‘सही’ हो, तो पूरी हो जाती है। सही आशा; सही कामना; अर्थात अपने पड़ौसी के लिए शुभ की कामना; पूरे विश्व के लिए सुख की कामना करना, और उस कामना के पूरा होने की दिशा में अपने विचार-कार्य और व्यवहार को सक्रिय करना। ‘सही आशा’ के पूरा होने की व्यवस्था है। - Dr. Ummedsingh Baid 'Sadhak'